Tuesday, January 18, 2022
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The Kashmir issue could have been settled amidst the celebration of victory in 1971 – India Hindi News


16 दिसंबर 1971 को दुनिया के नक्शे पर एक नए देश का निर्माण हुआ था, और उसे बनाने में सबसे बड़ा योगदान भारत का था। अहंकार में डूबा पाकिस्तान अपने ही एक हिस्से के लोगों पर बेइंतहा अत्याचार कर रहा था और जब भारत से इस अत्याचार के खिलाफ मदद मांगाी गई तो भारत ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए पूर्वी पाकिस्तान को एक नया रूप देते हुए ‘बांग्लादेश’ बना दिया। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस युद्ध में अपनी जीत को देश की सबसे बड़ी जीत के तौर पर भी देखा जाता है।

हर बार की तरह 1971 में भी पाकिस्तान ने ही युद्ध की शुरुआत की थी। लेकिन भारतीय वीरों के शौर्य के आगे पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था और उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान को आजादी मिली थी और उसे बांग्लादेश के नाम से जाना जाने लगा। उस वक्त भारत की कमान आयरन लेडी के नाम से जानी जाने वाली इंदिरा गांधी के हाथों में थी। लेकिन माना जाता है कि उस वक्त में अगर थोड़ी सी और समझदारी दिखाई गई होती तो आजादी के बाद से चला आ रहा कश्मीर मुद्दा भी सुलझ सकता था।

भुट्टो के बहकावे में आ गई थीं इंदिरा!
दरअसल 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान की हार के साथ ही भारत के पास उसके 93 हजार सैनिक भी बंदी थे। ऐसे में इंदिरा के सामने एक मौका था कि वो पाकिस्तान पर दबाव बनाकर कश्मीर मुद्दे के खात्मे के बदले उन पाकिस्तानी सैनिकों को रिहा करतीं। जानकार मानते हैं कि उस दौरान इंदिरा गांधी जुल्फिकार अली भुट्टो के बहकावे में आ गईं और वार्ता की मेज पर कश्मीर मुद्दे को लेकर निगोशीएशन नहीं कर पाईं। जिसकी वजह से आज भी कश्मीर का मुद्दा विवादित बना हुआ है।

भाजपा आज भी उठाती है सवाल
यही वजह है कि आज भी भाजपा इंदिरा गांधी और कांग्रेस सरकार की दूरदर्शिता पर सवाल उठाती है। भाजपा का मानना है कि वह एक बड़ा मौका था, अगर उस वक्त 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों के बदले कश्मीर मुद्दे के खात्मे की बात की गई होती तो आज ना ही घाटी में इस तरह के हालात होते और ना ही भारत पर आतंक का साया इतनी गहराई से मंडरा रहा होता।



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