Thursday, October 22, 2020
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tata बनाम मिस्त्री साइरस के साथ किसी भी आरोप का व्यापार नहीं करना चाहते थे, उन्होंने कहा कि रिटन टाटा


टाटा ग्रुप के पूर्व चैयरमैन रतन टाटा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि साइरस मिस्ट्र को बाहर करने का निर्णय सुखद नहीं था, लेकिन उसमें टाटा ग्रुप कि गरिमा के अनुरूप गुणों की कमी थी। रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के कानूनी दांव-पेंच के बीच यह एक नया मोड़ आया है। टाटा ने अपने प्रतिउत्तर में साइरस मिस्त्री को ट्रोजन हॉर्स कहते हुए कहा कि उसके द्वारा किया गया कार्य और लगाए गए आरोपों को अस्वीकार कर दिया गया है।

टाटा ने अपने नवीनतम हलफनामे में कहा, "मैं विनम्रता के साथ यह कहता हूं कि यदि यह मामला मेरे प्रदर्शन का मूल्यांकन है और मैंने अपने कार्यकाल के दौरान टाटा समूह के लिए क्या किया है, तो यह दूसरों को तय करना है। मैं सम्मानपूर्वक इस तरह की बहस से बचूंगा। अपने जीवन के इस पड़ाव में, मैं अपने प्रदर्शन का समर्थन या बचाव नहीं करना चाहता हूँ। "

यह भी पढ़ें:टाटा बनाम साइरस मिस्त्री: एनसीएलएटी के फैसले को टाटा लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी

इससे पहले टाटांस द्वारा राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय संस्था (एनसीवीटी) के 18 दिसंबर के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती देने के एक दिन बाद टाटांस के पूर्व प्रमुख सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। अक्टूबर 2016 में टाटांस के अध्यक्ष के रूप में मिस्त्री को बर्खास्त किए जाने के बाद टाटा समूह और शापूरजी पल्लोनजी समूह अपनी दो निवेश फर्मों के माध्यम से एक लंबी कानूनी लड़ाई में उलझे हुए हैं।

यह भी पढ़ें: देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने के प्रमुख रहे रतन टाटा को आखिर किस बात का मलाल है?

18 दिसंबर 2019 को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल ने साइरस को आरोपों से मुक्त करते हुए उनके पक्ष में दिया। ट्रिब्यूनल ने उन्हें फिर से टाटा सन्स का चेयरमैन नियुक्त करने का आदेश दिया था। इसके बाद टाटांस ने ट्रिब्यूनल के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

बता दें कि रतन टाटा के रिटायर होने के बाद साइरस मिस्त्री 2012 में टाटांस के छठे चेयरमैन बने। उन्हें अचतन 2016 में उनके पद से हटा दिया गया था। इसके बाद टीसीएस के प्रबंध निदेशक और सीईओ एन चंद्रशेखरन को टाटांस का नया चेयरमैन बनाया गया। दो महीने बाद मिस्त्री की ओर से उनके परिवार की दो इन्वेस्टमेंट कंपनियों- साइरस इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड और स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट को टाटा सन्स के फैसले को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) की मुंबई बेंच ने चुनौती दी थी। दलील था कि मिस्त्री को हटाने का फैसला कंपनीज एक्ट के नियमों के मुताबिक नहीं था।



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