Wednesday, August 10, 2022
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supreme court order: ‘हैरान हैं, दुखी भी…जल्दबाजी में सुनाया फैसला’… सुप्रीम कोर्ट ने बुलंदशहर के 3 लोगों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला – supreme court acquits three on death row for murder of six in uttar pradesh bulandshahr


बुलंदशहर
निचली अदालत और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई। मौत की सजा से बचने के लिए आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज होना तय माना जा रहा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए उनकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। यह मामला बुलंदशहर में छह लोगों की हत्या से जुड़ा है। घटना 2014 में हुई थी।

जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ उचित संदेह से परे मामले को साबित करने में विफल रहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में हैरानी और दुख व्यक्त किया कि कैसे ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए केस निपटाया।

‘अनुमानों पर दी गई सजा’

सुप्रीम कोर्ट ने HC के कुछ निष्कर्षों पर हैरानी जाहिर की और कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र के लिए विदेशी हैं। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट का यह आदेश अनुमानों पर आधारित है। पीठ ने आरोपी मोमिन खान, जयकम खान और साजिद की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए कहा, ‘हाई कोर्ट ने इस मामले को जिस तरह से निपटाया है उससे हम चकित हैं। हम पाते हैं कि अभियोजन पक्ष मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। आरोपी का दोषसिद्ध होना और उसे मौत की सजा देना कानून संगत नहीं है।’

यह है मामला
मोमिन पर जयकम और साजिद की मदद से एक संपत्ति विवाद के बाद अपने माता-पिता, भाई और अन्य रिश्तेदारों की हत्या करने का आरोप लगाया गया था। मोमिन की पत्नी को भी निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी लेकिन हाई कोर्ट ने उसकी सजा को खारिज कर दिया था।

‘जल्दबाजी में निपटाया मामला’
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 23 जनवरी 2014 को चारों आरोपियों ने बुलंदशहर में मोमिन के पिता, मां, भाई शौकिन खान, भाभी शन्नो, भतीजे और उसके भाई की भतीजी की हत्या कर दी। सभी सबूतों का विश्लेषण करने के बाद, शीर्ष अदालत ने कहा कि जब सबूत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे तो निचली अदालत और हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी कैसे ठहरा दिया। पीठ ने कहा, ‘यह वास्तव में आश्चर्यजनक है, कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने मामले को इतनी जल्दबाजी में कैसे निपटाया? जबकि केस चार लोगों के जीवन और मौत का सवाल था।

‘सजा देने से पहले गहनता से करें विचार’
बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के निष्कर्ष न केवल साक्ष्य अधिनियम के सुस्थापित कानून के विपरीत थे। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से अपेक्षा की जाती है कि वे आरोपी को सजा देने से पहले गहनता से विचार करें।



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