Sunday, December 6, 2020
Home Uttar Pradesh 253 साल की मां दुर्गा की प्रतिमा का अबतक नहीं हो पाया

253 साल की मां दुर्गा की प्रतिमा का अबतक नहीं हो पाया


माँ की मूर्ति को हर 8-10 साल पर नया कलर किया जाता है।

माँ की मूर्ति को हर 8-10 साल पर नया कलर किया जाता है।

काशी के बंगाली टोला स्थित दुर्गा बाड़ी में 253 साल पहले नवरात्र के मौके पर मां दुर्गा (मां दुर्गा) की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जो अबतक मौजूद है। मिट्टी की ये प्रतिमा आज भी उसी तरह दिखती है।

वाराणसी। शारदीय नवरात्र (नवरात्र) के मौके पर दुर्गा प्रतिमाओं पंडालों में स्थापित की जाती हैं, फिर उन्हें दशहरा के बाद विसर्जित कर दिया जाता है। लेकिन आप ये जानकर हैरान हो जाएंगे कि काशी (काशी) में एक ऐसी दुर्गा प्रतिमा है, जिसका पिछले 253 वर्षों से विसर्जित नहीं की गई है। आज भी ये मिट्टी की प्रतिमा वैसी ही दिखती है, जैसे 253 साल पहले दिखती थी।

काशी के गलियों में लघु भारत बसी हुई है। यहां हर धर्म और समुदाय के लोग रहते हैं। काशी के बंगाली टोला स्थित दुर्गा बाड़ी में 253 साल पहले नवरात्र के षष्ठी अर्थात छठवें दिन मां दुर्गा की प्रतिमा एक बंगाली परिवार ने स्थापित की थी। नवमी तक धूमधाम से पूजा-पाठ हुआ लेकिन दशहरा के दिन जब विर्जित करने के लिए प्रतिमा को उठाया गया, तो प्रतिमा हिली तक नहीं। दर्जनों लोगों ने लाख प्रयास किए लेकिन सभी प्रयास असफल हो गए। तब से आज तक ये प्रतिमा यू हीं स्थापित है।

परिवार के मुखिया के सपने में आई माँ!

प्रतिमा स्थापित करने वाले बंगाली परिवार के 5 वीं पीढ़ी के मुखिया हेमंत बताते हैं कि 253 साल पहले जब दशहरे के दिन माता की प्रतिमा नहीं उठी तो दूसरे दिन विसर्जित करने की योजना बनाई गई। लेकिन उसी रात परिवार के मुखिया को रात में माता-पिता का सपना आया कि वे यहीं वास करेंगी। केवल ग्राम और चने का भोग लगाकर उन माता को यहीं स्थापित करें। तब से मां यहीं स्थापित हैं।आज भी मूर्ति वैसी ही दिख रही है

253 साल बाद भी मां की प्रतिमा वैसी की वैसी ही हैं। सिर्फ हर साल कपड़े बदल जाते हैं। माता के प्रतिमा में लगी मिट्टी और पुआल आजतक वैसा ही है। 8 से 10 साल के अंतराल पर प्रतिमा को रंगीन किया जाता है। हर साल नवरात्र के मौके पर दुर्गाबैरी को आमलोगों के खुले दिए जाते हैं।

माता के इस चमत्कार को पूरा बनारस नमस्कार करता है। बनारस में रहने वाला हर शख्स नवरात्र में यहां आकर माता का आशीर्वाद लेते हैं। कहा जाता है कि माता-पिता अपने यहाँ आने वाले हर भक्त की मुरादें पूरी करते हैं।



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