Wednesday, December 7, 2022
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समाजवादी पार्टी की नई रणनीति: समाजवादी पार्टी की नई रणनीति ने भाजपा की परेशानी को बढ़ा दिया है पार्टी ने लो प्रोफाइल प्रचार के जरिए भाजपा की रणनीति को काटने पर काम तेज कर दिया है

लखनऊ: चुनावी हार-जीत सामान्य प्रक्रिया है। चुनाव के बाद कारण भले ही कुछ भी गिनाए जाएं, वास्तविकता का आभास राजनीतिक मैदान में उम्मीदवारों से लेकर राजनीतिक दलों तक को चल जाता है। इसके आधार पर आगे की नीतियां और रणनीति बनाई जाती है। समाजवादी पार्टी ने भी पिछले दिनों में लगातार जीत के समीकरण तलाशने के प्रयास किए हैं। हालांकि, उनमें सफलता नहीं मिली। पहले सत्ता में रहते हुए लोकसभा चुनाव 2014 में यूपी की 80 में से 75 सीटों पर हार झेलने वाली समाजवादी पार्टी ने यूपी चुनाव 2017 में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। प्रदेश में खाट पर चर्चा चली। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ अखिलेश यादव ने चुनावी रैलियां की। लेकिन, नजीता गठबंधन के पक्ष में नहीं आया। फिर, आया लोकसभा चुनाव 2019। अखिलेश यादव ने मायावती के साथ गठबंध किया। दोनों दल करीब 24 साल बाद एक साथ आए। उम्मीद थी कि माय के साथ दलित गठबंधन भाजपा के विजय रथ को थामने में सफल होगी, लेकिन नतीजा फिर गठबंधन के खिलाफ आए। लखनऊ में बने गठबंधन की आंच गांवों में पड़ी दोनों पार्टियों के वोट बैंक की विभाजन की गांठ को सुलगाने में कामयाब नहीं हो पाई। सपा-बसपा गठबंधन कोई बड़ा करिश्मा नहीं कर पाई। इसके बाद आया यूपी चुनाव 2022। इस बार अखिलेश यादव ने छोटे-छोटे जातीय समीकरणों के आधार पर बने राजनीतिक दलों से गठबंधन किया। उनके वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश थी। लेकिन, इसका फायदा छोटे दलों को तो मिला, सपा इसका लाभ नहीं ले पाई। असर, आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उप चुनाव तक दिखा। लेकिन, अब समाजवादी पार्टी ने रणनीति बदल दी है। बदली रणनीति का असर भाजपा पर देखने को मिल सकता है।

गोला गोकर्णनाथ सीट से मिले सकारात्मक संदेश
गोला गोकर्णनाथ सीट पर समाजवादी पार्टी को नई रणनीति के सफल होने का संदेश मिला है। हालांकि, इस सीट पर सपा हार गई, लेकिन वोट प्रतिशत में सुधार ने बड़ा संदेश दे दिया है। गोला गोकर्णनाथ सीअ पर यूपी चुनाव 2022 में समाजवादी पार्टी को 37.4 फीसदी वोट मिले थे। करीब सात माह बाद हुए उप चुनाव में पार्टी ने अपने वोट शेयर में सुधार करते हुए 40.52 फीसदी वोट शेयर हासिल किया। वोट शेयर में इस वृद्धि को बारीकी से देखने जाएंगे तो आपको कई चीजें साफ हो जाएंगी। दरअसल, गोला गोकर्णनाथ सीट पर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तक प्रचार के लिए नहीं पहुंचे थे। इसके बाद भी वोट शेयर बढ़ गया। इसके पीछे का कारण मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति रही।

समाजवादी पार्टी ने भव्य जनसभाओं की जगह जमीन पर काम करना शुरू किया। इस क्रम में मतदाताओं से सीधा संपर्क किया गया। वोटरों से कनेक्ट के लिए कार्यक्रम तैयार किए गए। सपा के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो पार्टी अपने चुनावी अभियान को लो प्रोफाइल रखकर काम करने की तैयारी थी।

प्रशासन की नजरों से बचने की भी रणनीति
समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से बचने की रणनीति पर भी काम शुरू किया। पार्टी ने चुपचाप काम करने की रणनीति अपनाई। भाजपा की नजरों से बचते रहे। लो प्रोफाइल प्रचार अभियान यानी नुक्कड़ सभाओं और वार्ड स्तर पर प्रचार अभियान ने पार्टी उम्मीदवार को माउथ पब्लिसिटी दी। सपा की इस रणनीति को भाजपा के सीनियर नेता भी स्वीकार कर रहे हैं। एक नेता ने तो यहां तक कहा है कि अगर सपा आम चुनाव की तरह ही इस उप चुनाव को लड़ती तो भाजपा की जीत का अंतर और बड़ा हो जाता। सपा की रणनीति ने भाजपा के लिए मुकाबला कुछ कठिन जरूर बना दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी ने यहां से केवल इस कारण जीत हासिल की, क्योंकि हम हर चुनाव को गंभीरता से लेते हैं। उप चुनावों में भी पार्टी पूरी ताकत से चुनावी मैदान में उतरती है।

उप चुनाव में भाजपा की ओर से प्रदेश सरकार के करीब एक दर्जन मंत्री प्रचार अभियान में उतरे थे। पार्टी के राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पदाधिकारी तक आए। सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक जनसभा को संबोधित किया। इसके उलट सपा की ओर से अखिलेश यादव तक प्रचार में नहीं आए। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद तमाम नेता अंतिम क्रियाकर्म और शोक में थे।

बनाई गई नई रणनीति
चुनाव को लेकर इस दौरान एक अलग रणनीति बनाई गई। अखिलेश यादव की चुनावी मैदान में अनुपस्थिति को पार्टी की ओर से एक संकेत के रूप में पेश किया गया। साबित करने की कोशिश की गई कि उप चुनाव को लेकर पार्टी गंभीर नहीं है। सपा के एक सीनियर नेता का कहना है कि नेताजी के निधन के बाद गोला गोकर्णनाथ में नेताओं को उनकी जाति के मतदाताओं से बात करने के लिए भेजा गया। हमने जमीन पर इन नेताओं के साथ काम किया। जाति वर्ग के भीतर से उठ रहे मुद्दों को समझा और इस आधार पर रणनीति तैयार की। इसका फायदा हमें मिला है।

प्रदेश अध्यक्ष 10 दिनों तक जमे
समाजवादी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल स्वयं 10 दिनों तक यहां पर डेरा जमाए रहे। ओबीसी समुदाय से आने वाले इस नेता के यहां रहने का प्रभाव काफी देखा गया। उनके अलावा यूपी चुनाव 2022 से पहले भाजपा छोड़कर सपा में जाने वाले सीनियर ओबीसी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य भी क्षेत्र में तीन दिनों तक क्षेत्र में रहे। गोला गोकर्णनाथ सीट पर कुर्मी और मुसलमान वोटरों की संख्या अधिक है। इसके बाद ब्राह्मण और दलित वोटरों की संख्या है। जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सपा ने राम अचल राजभर, लालजी वर्मा, नरेंद्र सिंह वर्मा, राजेंद्र कुमार, तिलक चंद्र अहिरवार, इंद्रजीत सरोज, राजपाल कश्यप जैसे नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा। राजेंद्र चौधरी, आनंद भदौरिया और अन्य नेता भी चुनाव प्रचार में उतरे।

वन वे भाषण की जगह टू वे कम्युनिकेशन
समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि हमारी कोशिश वन वे भाषणों की जगह टू वे कम्युनिकेशन पर जोर दिया। पिछले दिनों में बड़ी रैलियों का परिणाम हम देख चुके हैं। रैलियों और जनसभाओं की जगह छोटी-छोटी रैलियों पर जोर दिया। नेताओं का कहना है कि लाउडस्पीकर पर भाषण से संवाद एक तरफा होता है। इसकी जगह हमने 50 से 200 लोगों की छोटी-छोटी बैठकें की। वोटरों से व्यक्तिगत संपर्क करने का प्रयास किया गया। उनकी समस्याओं को सुना गया। उसके समाधान पर चर्चा हुई। मतदाताओं से सीधा संवाद हुआ तो भाजपा की जन विरोधी नीतियों के बारे में जानकारी दी गई। इसका असर पड़ता दिखा। इसके बाद भी हमारे वोट उस लिहाज से कम आए हैं। सीनियर नेता का कहना है कि कारणों के विवरण मांगे गए हैं। जिला पार्टी इकाई की रिपोर्ट पर गौर किया जाएगा।

लो प्रोफाइल जनसभाओं से मिली बढ़त
लखीमपुर खीरी के सपा जिला अध्यक्ष रामपाल सिंह यादव ने कहा कि हमने बूथ प्रबंधन पर काम किया। स्थानीय प्रशासन की नजर से बचने के लिए अपने नेताओं की जनसभाओं को लो-प्रोफाइल रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय प्रशासन खुले तौर पर भाजपा उम्मीदवार का समर्थन कर रहा था। उनका कहना है कि हमें डर था, अगर सरकार को पता चलता कि हमारी सभाओं में भीड़ आ रही है तो वह सपा के वोटरों और कार्यकर्ताओं को परेशान करती। सपा की रणनीति पिछले उप चुनावों के विपरीत थी। आजमगढ़ लोकसभा सीट उप चुनाव से बिल्कुल अलग।

पार्टी आजमगढ़ और रामपुर में उप चुनाव का प्रचार करने वाले पार्टी नेताओं के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रही थी। मुख्य धारा की मीडिया में इन कार्यक्रमों का कवरेज हो रहा था। अपनी जनसभाओं में अधिक भीड़ लाने की कोशिश की जा रही थी। पार्टी ने गोला गोकर्णनाथ उपचुनाव में इस तरह के प्रचार से परहेज किया।

सपा ने भी उतारा ब्राह्मण उम्मीदवार
सपा ने भाजपा के अमन गिरी के खिलाफ रणनीति के तहत एक ब्राह्मण उम्मीदवार विनय तिवारी को मैदान में उतारा। गिरि ओबीसी के रूप में रजिस्टर्ड हैं। हालांकि, वे मंदिर की सेवा का काम करते हैं। इसलिए, ऊंची जाति से उनका जुड़ाव है। ब्राह्मणों को बड़े स्तर पर भाजपा का समर्थक माना जाता है। सपा की ओर से ब्राह्मण उम्मीदवार का दांव काम कर गया। पार्टी का दावा है कि हर दौर की मतगणना में पार्टी को अच्छी संख्या में वोट मिले। पहली बार बूथ स्तर पर सपा को काम करते देखा गया। वहीं, भाजपा नेतओं का कहना है कि सीएम योगी आदित्यनाथ के भाषण ने हवा का रुख मोड़ दिया। ऐसा हो सकता है। गन्ना किसानों में बकाए भुगतान को लेकर नाराजगी थी। सीएम ने बकाए भुगतान में देरी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही। क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट की बात कही। वहीं, अमन गिरि के परिवार की प्रतिष्ठा भी काम आई। अरविंद गिरि यहां से पांच बार विधायक रह चुके हैं। इसने उनके बेटे की जीत में भी बड़ी भूमिका निभाई।

…तो क्या सच में सपा का अंडर करंट था?
तमाम दावों और प्रतिदावों के बीच सवाल एक ही है क्या गोला गोकर्णनाथ में सच में समाजवादी पार्टी का अंडर करंट था? यूपी चुनाव 2022 में अरविंद गिरि ने 29,294 वोटों से जीत हासिल की थी। अरविंद गिरि को तब 1,26,534 वोट मिले थे। दूसरे नंबर पर रहे विनय तिवारी को 97,240 वोट मिले थे। उस चुनाव में तीसरे स्थान पर बसपा की शिखा पटेल रही थीं। उन्हें 26,970 वोट मिले थे। अरविंद गिरि को कुल पड़े वोट का 48.67 फीसदी वोट मिला। वहीं, सपा के विनय तिवारी को 37.40 फीसदी और बसपा को 10.37 फीसदी वोट मिले थे। गोला विधानसभा उप चुनाव में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं दिया था। इस कारण बसपा को मिलने वाले वोट में बिखराव हुआ।

राजनीतिक समीक्षक और चुनावों पर करीबी से नजर रखने वाले भी इस बात को मानते हैं। दरअसल, गोला उप चुनाव में भाजपा के अमन गिरि को 1,24,810 वोट मिले। वहीं, भाजपा के विनय तिवारी को 90,512 वोट। तीसरे स्थान पर रहे निर्दलीय प्रवेश प्रताप सिंह को महज 2709 वोट ही मिल पाए। भाजपा को कुल पड़े वोट का 55.88 फीसदी और सपा के विनय तिवारी को 40.52 फीसदी वोट मिले। वोट प्रतिशत के लिहाज से देखें तो सपा को करीब 3 फीसदी वोटों का फायदा हुआ है। वहीं, भाजपा के वोट प्रतिशत में 7 फीसदी से अधिक का उछाल आया।

समाजशास्त्री डॉ. रणधीर कुमार सिंह कहते हैं कि चुनाव में दो-तरफा लड़ाई में वोट दो पाटों में बंटता है। जब तीसरा पक्ष नहीं था और तैयारियां पुख्ता थीं तो फिर वह वोट में दिखना चाहिए। आप आंकड़ों पर गौर करेंगे तो सपा के वोट में करीब 7 हजार की कमी आपको देखने को मिलेगी। वहीं, उप चुनाव में भाजपा महज 2 हजार वोट गंवाती दिख रही है। इस एंगल पर भी सोचना चाहिए। हालांकि, दो-तरफा मुकाबलों में फायदा या नुकसान दो ही पार्टियों के बीच होता है।

क्या प्रभावित होगा मैनपुरी, रामपुर और खतौली?
सवाल यह भी है कि क्या मैनपुरी, रामपुर और खर्ताली में होने वाले उप चुनावों पर भी सपा की रणनीति का प्रभाव पड़ेगा। इसमें दो सीटें समाजवादी पार्टी का गढ़ हैं। ऐसे में यहां पर बूथ लेवल तक सपा की कमेटियां हैं। ऐसे में उन्हें एक्टिवेट करना जरूरी होगा। भाजपा अपनी तैयारी कर रही है। मानकर चलिए कि तीनों सीटों पर अन्य विपक्षी पार्टियां यानी बसपा और कांग्रेस अपने उम्मीदवार नहीं देंगी। इस हिसाब से मुख्य लड़ाई समाजवादी पार्टी और भाजपा में होनी है। भाजपा अपने पन्ना प्रमुख और बूथ लेवल कमेटियों के दम पर चुनावों में जीत दर्ज करती आई हैं। मैनपुर और रामपुर सीट को बचाने की चुनौती समाजवादी पार्टी के सामने है। भाजपा तो यहां उनकी परेशानी बढ़ा रही है। वहीं, खतौली में पहले ही रालोद प्रमुख जयंत चौधरी अपनी चुनावी अभियानों का आगाज कर चुके हैं। ऐसे में तीनों चुनाव के परिणामों पर हर किसी की नजर रहेगी।


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