Thursday, August 6, 2020
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रामजन्म भूमि अनंदोलन महंत अवैद्यनाथ महंत दिग्विजयनाथ के बाद आंदोलन का नेतृत्व करते हैं


अयोधियन में श्रीरामजन्न्मभूमि पर मंदिर निर्माण की अधूरी परिस्थितियों के साथ गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ ने 28 सिंघबर 1969 को समाधि ले ली। उनके अन्तरधिकारी महंत अवेद्यनाथ ने भी गोरक्षपीठाधीश्वर बनते ही एलान कर दिया कि राम जयंमभूमि की मुक्ति तक चैन से नहीं बैठेंगे।

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महंत अवेद्यनाथ का मानना ​​था कि देश में राजनीतिक परिवर्तन किए बगैर उनका लक्ष्‍य पूरा नहीं होगा। इसके लिए उन्होंने हिन्दू समाज के संगठन पर अपना धयान केंद्रित किया। 1980 में महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति से संन्यास ले लिया था लेकिन मंदिर निर्माण को लेकर उनका संघर्ष चलता रहा है। 1984 में उन्हें एक बड़ा कामयाबी मिला। लगातार कोशिश करते-करते आखिरकार वह देश के शैव-वैष्णव, सभी पंथों के धर्माचारों को एक मंच पर लाने में कामयाब रहे। श्रीराम जयंम मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया। महंत अवेद्यनाथ इसके आजीवन अधर्मक्ष रहे। उधर, देश में राममंदिर आंदोलन के लिए जन समर्थन बढ़ाने का अभियान चल रहा था।

इधर, कानून-व्यवस्थाओं कायम रखने के लिए जयंमभूमि पर तैनात पुलिसकर्मियों ने विवादित ढांचे के आंतरिक आंगन के दरवाजे पर ताला लगा दिया। जनता को पूजा के लिए अंदर जाने से रोक दिया गया। २४ 1984 में बिहार के सीतामढ़ी से श्रीराम जानकी रथयात्रा निकाली गई। यह रथ छह अकटार्ट 1984 को अयोध्या पहुंच गया। सीन अक्टट 1984 को अयोधियन में सरयू नदी के तट पर हजारों रामभक्तों ने संकल्पी लिया। इसी तरह की सभाएं प्रयाग और अन्य प्रतिष्ठानों पर भी हुईं। आठ अक्टट 1984 को रथयात्रा के लखनऊ पहुंचने पर बेगम हजरत महल पार्क में समनमेल हुआ, जिसमें 10 लाख से अधिक लोगों ने हलासा लिया। 31 अक्टट और एक नवमम्बर 1985 को कर्नाटक के उडुपी में हुए धर्मसंसद के दूसरे अधिवेशन में 175 समप्रदायों के 850 धर्माचार्य शामिल हुए।

गोरखनाथ हस्ताक्षरित विद्यापीठ के पूर्व छात्र और वर्तमान में जेएनयू दिलनाली के संचारकृत और प्राधान विद्या अधद्ययन संकेत कल्याण के संकाय प्रमुख प्रो.संतोष शुक्लल बताते हैं कि महंत अवेद्यनाथ के सभी धर्माधिकारियों के साथ बड़े अच्छे सामंत प्रबंधन थे। धर्मसंसद में सबकी मौजूदगी इसका प्रमाण थी। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के शोध अधनयेता रहे डॉ.सचिन राय 'श्री रामजन्तम भूमि आंदोलन और गोरक्षपीठ' विषय पर अपने शोध ग्राफ में बताते हैं कि इसी धर्मसंसद में निर्णय हुआ कि पैच नहीं खुला तो पूरे देश की हजारों धर्माचार्य अपने लाखों शिवाओं के साथ 9 मार्च 1986 से सप्रदायता विल। दिगाम्बर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्रदास ने घोषणा कर दी थी कि यदि तब तक सूखा नहीं खोला गया था तो वह आदममद कर लेंगे। स श्रेयाग्रता के संचालन के लिए महंत अवेद्यनाथ को अखिल भारतीय संयोजक पदों पर किया गया। 51 प्रमुख धर्माचारों की एक अखिल भारतीय संघर्ष समिति का गठन किया गया। एक फरवरी 1986 को फैजाबाद के जिला जज ने विवादित ढांचे के दरवाजे पर लगा ताला खोलने का आदेश दिया तो वहां महंत अवेद्यनाथ मौजूद थे।

यह निर्णय सुनाने वाले जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय गोरखपुर के ही जगन्नाथपुर मोहम्मदले के। कहते हैं कि इस निर्णय के बाद विभिन्न सरकार से उनकी नाराजगी हो गई और उनका तबादला ग्वालियर हाईकोर्ट कर दिया गया। 1995 में गलतियां होने के बाद कृष्ण मोहन पांडेय ने 'अंतरात्मा की आवाज' किताब लिखी, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया कि अयोध्या में राम मंदिर कहे जाने वाले स्थान के बारे में उन्होंने जो फैसला लिया वह उनकी अंतरात्मा की आवाज थी।

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नाथ पंथ के जानकार और महाराज प्रताप पीजी कालेज के प्राचार्य डा.प्रदीप राव ने बताया कि उस निर्णय के बाद महंत अवेद्यनाथ और अन्य धर्माचारों के आह्वान पर घर-घर दीये जलाए गए थे। 22 सिरोमबर 1989 को उनकी अधिनखता में दिलनाली में विराट हिन्दू हिंदू सम्मलेन हुआ। इसमें नौ नवंबर 1989 को जयंमभूमि पर शिलान्यास कार्यक्रम घोषित किया गया। तय समय पर एक दलित से शिलान्नसतेकर महंत अवेद्यनाथ ने आंदोलन को सामाजिक समरसता से जोड़ा दिया।

2012 में प्रकाशित पुस्तक 'रा सत्यता के अन्नय साधक महंत अवेद्यनाथ' में उल्पट्ट है कि 1989 में हरिद्वार के संत सममेलन में उन्हें मंदिर निर्माण की तिथि घोषित कर दी गई तो तत्कालीन गृहमंत्री बूट सिंह और मुख्यमंत्री नवीन नारायण दादत तिवारी ने उनसे मुलाकात की। बूटा सिंह इसे स्थापित करने वाले चाहते थे। कहते हैं कि बूटा सिंह की पूरी बात सुनने के बाद महंत अवेद्यनाथ ने जवाब दिया- 'यह फैसला करोड़ों लोगों को है।' निर्माण शुरू करने के लिए वह दिलनाली से अयोध्या के लिए रवाना हुए तो पनकी में गिरफ्तार कर लिए गए।

मंदिर को लेकर सरकार से गोरक्षपीठाधीश्वर का संघर्ष चलता रहा। 23 जुलाई 1992 को उनकी अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधान मंत्री पीवर्निस्मथा राव से मुलाकात की। बात नहीं बनी तो 30 अक्टट 1992 को दिलनाली में पांच धर्मसमांद में छह डिस्मैंबर 1992 को मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा शुरू करने का फैसला लिया गया। कारसेवा के बीजृदयवकों में महंत अवेद्यनाथ शामिल रहे।



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