Wednesday, April 14, 2021
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मुख्तार अंसारी के नेतृत्व में इस्तीफा देने वाले डीएसपी शैलेन्द्र सिंह फिर क्या हो सकते हैं? जी नहीं, जानिए क्यों?


लखनऊ। इस वक्त जबकि माफिया डॉन मुख्तार अंसारी (माफिया डॉन मुख्तार अंसारी) की चर्चा जोरों पर है, तब तक यूपी पुलिस के डिप्टी एसपी रहे शैलेन्द्र सिंह (पूर्व डीवाईएसपी शैलेंद्र सिंह) की चर्चा हो रही है। आखिरकार मुख्तार अंसारी पर कार्रवाई के कारण उन्हें इतनी शानदार नौकरी जो छोड़नी पड़ी थी। सोशल मीडिया में इस बात की मांग तेजी से उठी है कि शैलेन्द्र सिंह को दोबारा बहाल किया जाए। लोगों में मन में इसकी आस इसलिए जग गयी है क्योंकि सीएम योगी और पीएम मोदी दोनों ने शैलेन्द्र सिंह का उनके गर्दिश के दिनों में सलामती पूछी थी। तो क्या शिलेन्द्र सिंह ने यूपी पुलिस में अफसर बन सकते हैं?

सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में तर्क देते हुए कहा जा रहा है कि जब यूपी पुलिस के ही अफसर आईपीएस दावा शेरपा नौकरी छोड़कर फिर से नौकरी में आ सकते हैं तो शैलेन्द्र सिंह क्यों नहीं? बिहार के डीजीपी रहे गुप्तेश्वर पांडेय नौकरी छोड़कर फिर से नौकरी में आ सकते हैं तो शैलेन्द्र सिंह क्यों नहीं? उनके पक्ष में महाराष्ट्र के चिरचित पुलिस अफसर सचिन वाज़े का भी उदाहरण दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सचिन ने 2007 में पुलिस फोर्स से इस्तीफा दे दिया था और 2020 में वापस जावइन कर लिया था।

कैन्टन नहीं, कारण ये …

लेकिन, सच्चाई यह है कि शैलेन्द्र सिंह अब पुनः बहाल नहीं हो सकते हैं। अभी तक के किसी भी नियम के तहत उन्हें दोबारा नौकरी पर नहीं रखा जा सकता है। अब सवाल उठता है कि दावा शेरपा, गुप्तेश्वर पांडेय और सचिव वेज़ ने नौकरी पर कैसे रखा? तो जवाब ये है कि ये सभी का मामला शैलेन्द्र सिंह से अलग है। अंतर ये है कि शैलेन्द्र सिंह ने इस्तीफा दिया था जबकि दावा शेरपा और गुप्तेश्वर पांडेय ने वीआरएस माया को दिया था। सचिव वेज़ निलम्बित था। तीनों मामलों में बहुत मायने रखती हैं। यूपी पुलिस के डीजीपी रहे विक्रम सिंह ने कहा कि इस्तीफा देने और उसे सरकार द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद नौकरी में दोबारा वापसी नहीं हो सकती है। शैलेन्द्र सिंह ने 11 फरवरी 2004 को रिजफा दिया था और 10 मार्च 2004 को रिजफा स्वीकार कर लिया गया था।

दावा शेरपा, गुप्तेश्वर पांडेय और सचिव वेज़ नौकरी में फिर से कैसे आए?

IPS दावा सिंहपा ने 2008 में वीआरएस मांगा था। इसके बाद ये दार्जिलिंग चले गए। वहां से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाह रहे थे। 2009 के लोकसभा के चुनावों में इनकी जगह दूसरे को टिकट मिल गया। पूर्ण दावा शेरपा ने हार नहीं मानी और अगले तीन साल तक जूझते रहे। थक हार कर 2012 में नौकरी फिर से जवाइन कर ली। पुन: जवावाइनिंग इसलिए हो सकी क्योंकि सरकार ने इनका वीआरएस तब तक मंजूर नहीं किया था। शेरपा कहते हैं कि जितने दिन वे नौकरी में नहीं रहे उतने दिन की बिना सैलरी की छुट्टी लेकर वापस नौकरी ज्वाइन की। शेरपा ने कहा कि उनके बारे में ये जानकारी गलत फैलायी गयी है कि उन्होंने टिकट न मिलने पर निर्दलीय ही चुनाव लड़ा था। उन्होंने कोई चुनाव नहीं किया और ना ही कोई पार्टी जवाइन की थी।

गुप्तेश्वर पांडेय ने भी वीआरएस मांगा था

बिहार के डीजीपी रहे गुप्तेश्वर पांडेय की भी यही कहानी है। पांडे ने 2009 के चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस लिया था लेकिन, जब टिकट नहीं मिला तो वापस नौकरी में आ गए। अब वीआरएस मिल गया है।

सचिन वेज़ का निलंबन बना कवच

महाराष्ट्र के पुलिस अफसर सचिन वज़े की कहानी थोड़ी अलग है। मुम्बई के वरिष्ठ पत्रकार सुनील सिंह ने कहा, “सचिव वज़ ने वर्ष 2007 में जब महाराष्ट्र पुलिस से इस्तीफा दिया था तब तक वह वही थी।” वर्ष 2020 में उसकी उपस्थिति इसीलिए हो पायी क्योंकि निलंबन उसका कवच बन गय्या। अगर सिर्फ इस्तीफा देने का मामला होता है तो सचिन भी पुनर्स्थापना नहीं पाते।

वैसे शैलेन्द्र सिंह ये सच्चाई जानते हैं। इसीलिए उन्होंने कहा कि अब तो नौकरी छोड़े 17 साल हो गई हैं और मैंने ऐसा कोई विचार भी नहीं किया है, अब तो गंगा में बहुत पानी बह चुका है। मैं जो पूर्वोत्तर में काम कर रहा हूँ अब वही में मेरा मन रम गया है। बाकी किस्मत जहां ले जाती है।

एलएमजी केस में मुख्तार पर लगाया गया था पोटा

बता दें कि वर्ष 2004 में एसटीएफ की वाराणसी इकाई में तैनाती के दौरान शैलेन्द्र सिंह ने सेना से चुरायी गयी लाइट मशीन गन (एलएमजी) 200 कारतूसों के साथ बरामद की थी। तब उन्होंने मुख्तार अंसारी के खिलाफ पोटा के तहत मुकदमा दर्ज किया था। आरोप था कि मुख्तार एलएमजी खरीद रहे थे। शैलेन्द्र सिंह के शब्दों में इसके बाद उनके उपर मुख्तार से केस खत्म करने का दबाव डाला गया और जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा। इससे तंग आकर उन्होंने यूपी पुलिस के डिप्टी एसपी पद से इस्तीफा दे दिया था।





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