Thursday, August 6, 2020
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महंत अवैद्यनाथ के नेतृत्व में गांवों में राममंदिर मंदिर आंदोलन शिलापूजन – राममंदिर आंदोलन के अगुआ: धर्मसंसद ने किया आह्वान


अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पांच अगड़ों को भूमि पूजन होने वाला है। ऐसे में राममंदिर आंदोलन से गहरे जुड़े लोगों को बार-बार महंत अवेद्यनाथ की याद आ रही है। महंत अवेद्यनाथ ने 26 जुलाई 1988 को ही अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। विहिप के केंद्रीय महामंत्री रहे अशोक सिंघल और प्रदेश महामंत्री श्रीश्रीचंद्र दीक्षित के साथ देश में राजनीतिक परिवर्तन का संकल्‍प लेते हुए साफ कह दिया था कि इसके बिना जन्‍मभूमि की मुक्ति सम्‍भव नहीं है। इस एलान के साथ ही तय हुआ कि राम में आस्था रखने वाले देश-दुनिया के हर शासन करने को रामजन्मभूमि के मुक्तिसंग्राम से जोड़ना होगा। जनवरी 1989 में प्रयागराज में हुई धर्मसंसद में देश के हर गांव से पूजित एक श्रीरामशिला और हर आस्वथवन शासनशक्ति से सौ रुपए बढ़ाने का आह्वान हो गया है।

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इस आह्वान से गांव-गांव में उत्साह फैल गया था। छोटे-छोटे कार्यक्रम होते थे। शिलापूजन एक प्रतीक था। गोरक्षनाथ ने विद्यापीठ के पूर्व छात्र और वर्तमान में जेएनयू (नई दिल्नली) में संचार किए और प्रायोगिक शिक्षा अधिनयन शिक्षा विभाग के संकाय प्रमुख प्रो.संतोष शुक्लल विवादित ढांचे का पैच खोले जाने और धर्मसंसद के बाद देश भर में चले गए शिलापूजन अभियान के गवाह हैं। वह बताते हैं कि गांववाले इस विश्नवास के साथ कार्यक्रम में शामिल थे थे कि ये ईंटें रामजन्मभूमि पर प्रस्तावित भव्य मंदिर में लगेंगी। शिलापूजन ने पूरे देश के माहौल को राममय बना दिया। इसमें गरीब-अमीर और सभी जाति के लोगों ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। सारा अंतर मिट गया। राममंदिर के लिए हिन्दू समाज पहली बार इस तरह एकजुट नज़र आने लगा।

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इसके पहले 19 अक्टट 1988 को अयोधियन में सरु तट पर सात ईंटों का विधिवत पूजन करके यज्ञ शाला की सात परिक्रमा की गई। उसी समय श्रीराम जयंमभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए नौ नवमम्बर 1989 की तिथि का एलान भी कर दिया गया था। नाथ पंथ के जानकार और महाराणा प्रताप पीजी कालेज के प्राचार्य डा.प्रदीप राव बताते हैं कि 40 दिन तक शिलापूजन का कार्यक्रम तीन लाख गांवों में चला गया। 30 सिरोमबर 1989 से नौ नवमबर 1989 तक देश के कोने-कोने से शिलाएं अयोध्या पहुंचीं। इस दौरान राम मंदिर आंदोलन गांव-गांव तक फैल गया। इसी कारण से 30 अक्टूबर 1989 को राममंदिर के शिलान्यास और 30 अक्टूबर से दो नवंबर 1990 के कारसेवा कार्यक्रम को अपार जनमर्थन मिला।

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विदेश से भी आईआईएन शिलाएँ
राममंदिर निर्माण के लिए देश के कोने-कोने से ही नहीं अमरीका, इंग्लैंड, आस्त्रेलिया, न्यू और हालैंड से भी राम-शिलाएं अयोध्या पहुंची। एक दशक तक इन शिलाओं को विवादित स्थल से कुछ दूर फकीरेराम मंदिर में रखा गया था। 1998 में उन्हें रामघाट स्थित मंदिर निर्माण कार्यशाला परिसर में ले जाया गया। इस बीच मंदिर के लिए पत्तीधर तराशने का काम भी चलता रहता है। ये शिलाओं के विचारों का व सार्थक अब आया है। पाँच अगड़े को मंदिर की नींव से इसकी शुरुआत होगी।

देवरहवा बाबा ने दिया साथ बोले-हर हाल में बनेगा राममंदिर
एक फरवरी 1989 को प्रयागराज महाकुंभ में देश भर से जुटे साधु संन्यासियों के बीच प्रसिद्ध संत देवरहवा बाबा ने राममंदिर आंदोलन को एक नई उर्जा से भर दिया। अपने भाषण में उन्होंने कहा, 'श्रीराम जयंमभूमि हिन्दुओं की है और वहां मंदिर अवस्यय बनेगा।'

आंदोलन रामजन्मभूमि आंदोलन का इतिहास ’पर अपने शोध ग्राफ में महराणा प्रताप पीजी कालेज के निशानेबाजी शिक्षक शिक्षक डा.आविनाश प्रताप सिंह लिखते हैं, ंत महंत अवेद्यनाथ ने श्रीरामजयंतीम आंदोलन आंदोलन को रात्रिवयनपी दर्शाया है। उन्हें पता था कि जयंमभूमि की मुक्ति के लिए इसे जन-जन का मुद्दा बनाना होगा। उनके उद्धृवव में अलग-अलग समय पर उस समय के मुख्‍यमंत्री और प्रधानमंत्री से राममंदिर आंदोलन के नेताओं की मुलाकातें होती रहेंगी। लेकिन इन मुलाकातों के हर बार बेनतीजा रह जाने से महंत अवेद्यनाथ का शपचार मत बन गया था कि अनुकूल राजनीतिक शक्ति के बिना राममंदिर जैसा लक्ष्‍य हासिल करना मुश्किल है। इसी तरह के मत के कारण धर्मसंसद के प्रसवव पर उन्होंने राजनीति में लौटना पढ़वीकार किया और सड़क से संसद तक राममंदिर आंदोलन को गति देने में खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया।



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