Monday, January 18, 2021
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मकर संक्रांति पर रूठ जाता है सास और मनाती है बहू, देवीसप यह परंपरा है


मकर संक्रांति पर ब्रज में एक परंपरा प्रचलित है।  इस दिन सास रूठती है बहू मनाती है।

मकर संक्रांति पर ब्रज में एक परंपरा प्रचलित है। इस दिन सास रूठती है बहू मनाती है।

मकर संक्रांति 2021: ब्रज के जानकार योगेंद्र सिंह छोंकर बताते हैं कि ब्रज के लोक काव्‍य में भी सास और बहू का रिश्‍ता आमतौर पर टॉम और जेरी जैसा दिखता है। चाहे फाल्गुन की होली हो या सावन के झूले या सांझी के लोक काव्‍य, सभी में सास के प्रति कटुता देखने को मिलती है। लेकिन मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है जब यह इस कटुता को भरने का मौका बनकर आता है।

  • News18Hindi
  • आखरी अपडेट:14 जनवरी, 2021, 4:44 PM IST

नई दिलवाली मकर संक्रांति (मकर संक्रांति) को देशभर में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है लेकिन ब्रज की बात ही अलग है। यहाँ हर एक त्‍यौहार पर अलग-अलग परंपराएँ हैं और उनमें बड़े बड़े आनंद के साथ खेलया भी जाता है। मकर संक्रांति पर ऐसी ही एक परंपरा है सास के रूठने और बहू के मनाने की। यह परंपरा कई सदियों से चली आ रही है। कहा जाता है कि यशोदा मैया ने भी इसी तरह अपनी सास को मकर संक्रांति के दिन मनाया था। जिसके बाद से यह प्रेम के प्रतीक के रूप में परंपरा बन गई।

बेहद ही खोजासप इस परंपरा के बारे में ब्रज (बृज) के जानकार योगेंद्र सिंह छोंकर बताते हैं कि ब्रज के लोक काव्य पाठ में भी सास और बहू का रिश्‍ता आमतौर पर टॉम और जेरी जैसा दिखता है। चाहे फाल्गुन की होली हो या सावन के झूले या सांझी के लोक काव्‍य, सभी में सास के प्रति कटुता देखने को मिलती है। लेकिन मकर संक्रांति एक ऐसा त्यौहार है जब यह इस कटुता को भरने का मौका बनकर आता है। इस दिन रूठी हुई सास को मनाने की रस्मम की जाती है।

इस दिन बहू के मनाने के बाद सास उसे आर्शीवाद देती है और साल भर की जटिलताओं को माफ कर देती है ।।

मकर संक्रांति 2021: इस दिन बहू के मनाने के बाद सास उसे आर्शीवाद देती है और साल भर की जटिलताओं को माफ कर देती है।

ऐसी रूठती है सास और मनाती है बहूमकर संक्रांति (मकर संक्रांति) के दिन सास गुस्सा के साथ अपने घर से निकल जाती है और किसी पड़ोसन के घर जा बैठती है। कहा जाता है कि पहले सासें अपने गांव के कूओं के पास जा बैठती थीं या गांव से शहर को जाने वाले रासते पर जा बैठती थीं। इसके बाद बहू अपनी हमुम तमाम महिलाओं के साथ लोटे में जल, सास के लिए नए कपड़े, श्रंगार का सामान, तिलकुट, गजक, रेबडी आदि लेकर सास को मनाने जाती है। ये सभी महिलाएं रासते भी गीत गाती हैं। सास के पास पहुंचकर बहू पैर पकड़ती है और सहायक द्वारा उन्हें माफी मांगती है। थोड़ी देर में सास अपना गुस्सा भूलकर बहू को जीवित कर देती है। उसके द्वारा लाया गया सामान प्रेम से लेती है, उसे गले लगाती है और वापस घर को लौट चलती है।

गांवों में आज भी इस परंपरा का निर्वाह होता है

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