Monday, May 17, 2021
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भोजपुरी स्पेशल: रेणुजी के लेखन में फूल भी बा, शूल भी बा, धूल भी बा, खोज भारत के कल्पना भी …


फणीश्वरनाथ के विषाणु की कहानी के केंद्र में गाँव का होना। लेकिन ऐह गाँव में पूरे भारत की झलक रही है। रेणु जी स्वयं ‘मैला आंचल’ के बारे में लिखने बानी, एकरा में फूल भी बा, शुल भी बाबा, धूल भी बा, गुलाब बा, कीचड़ भी बा, सुंदरता भी बा, कुरुपता भी बा, हम एकरा में बच-बचा के ना निकल पियानी सामाजिक, धार्मिक अउर राजनीति शोषण के रेणुजी जइसन सजीव चित्रण कइले वइसन शायद कवनो दोसर लेखक ना कर पाइले। आज से पचास-पचपन वर्ष पहिले रेणुजी राजनीतिक बिरोधाभास के जइसन खाका खींचले रहन ऊ आज के दौर में भी सटीक बा। उनकर कहानी में अंतर्दृष्टि भारत के भी कल्पनाशील होने की।

गनपत के बहाने कौमनिस्ट के सच
राजनीति में कार्जकरता के कथान फजीहत होला अह सच के रेणुजी आपन कहानी ‘आत्मसाक्षी’ में देखवले बाबड़े। 1964 में भारत के कौमनिस्ट पाटी में बंटवारा हो गइल रहे। आत्मसाक्षी कहानी के पात्र गनपत एह बंटवारा से बेहाल हो जात बाबड़े। उनकर तुमन घर-बार ना रही। अपना दम प एसटी के आफिस खाड़ा कइले रहन। आफिसे उनकर निवास। लेकिन पाटी में बंटवारा के बाद गनपत के आफिस छोड़े के हुकुम सुना दिहल जात बा। उनका के पीटी से भी हटा दिहल जात बा। तब गनपत के राजनीति से मोहभंग हो जाते हैं। ऊ अपना के ठगिल महसूस करत बाबड़े। दिन रात गांव-गांव में घूम के कौमनिस्ट पाटी के परचार कइले लेकिन मिलल का? राजनीति में कार्जकरता के कइसे सोसन होला, एह कहानी में बड़ा सटीक चित्रण कइल गइल बा।

हर अदिमी के दू टुकड़ा, दू मुखड़ा रेणु जी आत्मसाक्षी कहानी में लिखले बाबड़े, परिवार, जाट, धरम अउर हर अन्याय से लड़े वला चेतावनी गनपत आज अखड़ा में हारल पहलवान जइसन चित गिरनेल बाबड़े। सैम केहू उनका पीठ का एक लात लगा के, गारी दे के चल देता है। पैतीस साल तक मुंह, जीभ, मन का लगाम लगा के ऊ सार्वजनिक के काम कइले। केहू के एगो तिनको ना थवले, ना पाटी के एक प्यासा दिखने कइले। माई-बाप, भाई-बहिन, गाँव समज से भी बढ़ के पाटी के झंडे के समझले। लेकिन सैम बेकार हो गइल। गनपत के बूझत बा कि सूरज-चांद में भी गिरने वाली ग्याल। दुनिया के हर बात दू भाग में बंटा गाइल। हर अदिमी के दू टुकड़ा, दू मुखड़ा हो गइल बा। उनकर मन उनका सवाल पूछत बा, गनपत तहर लीडर लोग धरम के अफीम कहे ला लेकिन ऊ लोग काहे ना अपना बेटा-बेटी के बियाह दोसरा जात में करे ला? पुत्र के बियाह में कामरेड रामलगन सरमा 25 हजार रोपेया गिनवले रहन। गनपत के मन पूछता है बा, तहरा लीडर लोग के लका दार्जिलिंग, देहरादून के इंग्लिश स्कूल में पढ़ेला, तहर पाट के सचिव के मेहरारू कांग्रेसी मंत्री बने खातिर जात-पात कर रहल बाड़ी, ई कौमनिस्ट पाट के कइसन रूप सामने आ गइल बा? रेणुजी अपनी कहानी में राजनीतिक उत्पीड़न के जवन चित्र ऊ पचास सालपहिले पुलले रहन ऊ आज बी जेंव के तनव लागत बा। आजो नेता खातिर अगर नियम और कार्जकरता खातिर अलग नियम बा।

जवन देखले भोगले उहे लिखले

रेणुजी के जीवन में गाव अउर शहर के अदभुत मेल बा। ऊ हिंदी साहित्य के पहिल लेखक रहन जे खुद खेती करत रहलन। जब धान के रोपनी के समय आवे त s ऊ आपन गांव और -ही हिंगना जा रहे हैं। रोपनी डोभनी खाम हो जाव त s ऊ पटना आ के खालिक सुधारों। उनकर एक फोटो बहुत मेसेज बा बा जवना में ऊ बाबा नागार्जुन संगे खेत में धान रोप रहल बाबड़े। गांव में जवन ऊ देखले-भोगले, ओकरे के कहानी में उतरे। रेणुजी के लेखनलाल नरर्ताज में समकालीन राजनीति के अदभुत बरन बा। उनकर लिखल अलर्ताज वी चुनावी लीला-बिहारी तर्ज ’में 1967 के बिधानसभा चुनाव के पहिले केछते बा। जाइसे आज के सरकार अउर विपक्ष अखबर अउर पत्रकार से नाखुश रहे ला उहे हाल 1967 में भी रहा। रेणुजी लिखले बाड़े, पत्र अउर पत्रकार से केहू खुश नइखे। ना बिरोधी दल के लोग न सरकार गए रहल कांग्रेस के लोग। बिरोधीदल के सभा में एक पत्र के मुख्यमंत्री के समाचार कहल गइल। जब कि ओही पेपर के एगो रिपोरटर के मुख्यमंत्री के आदिमीडिंग देले रहन। मुख्यमंत्री के अनराजी रहे कि ऊ पत्रकार आपन बात उनका मुँह में पेन्हा देत रहन। जेकर राजनीतित से वास्ता नइके ओह लोग के कहनेनाम बा कि चुनाव में पतरकार लोगन के पाँचों अंगूरी घीव में बा।

रेणुजी निर्दोष पतरकार भी बने रहे
एही रिकॉर्डिंगर्ताज में रेणुजी लिखले बाड़े, टिकट के लड़ाई में जीतल कांगरेसी लोगन के सदाकत आसाराम में मिलन अउर भोज के आयोजन भइल। अगिला दिन अखबरा में खबर छपल कि हर कॉनिडेटिव के एक जीप अउर अइली हजार रोपेया मिले। चुनावी लीला शुरू बा। अब देखते के बा कायस्थ कांग्रेसी, राजपूत कोंगरेसी, भूमिहार कोंगरेसी, मैथिल बराहमन कांग्रेसी, बैकवर्ड कोंगरेसी, मैजारोटी-माइनोरिटी ग्रुप के अनराज अउर नेता चुनाव में कवनन देखाईन, ई देखा वला बात होई। 1967 के चुनाव में रेणुजी जवन आशंका जतवले उहे भईल। आपस में लड़त-अलड़त कोंगरेस के करारी हार भईल। बिहार में पहिला बेर अवैध वेंडिंगरेसी सरकार बनल। रेणुजी मिजाज से क्रांतिकारी अउर बिचार से समाजवादी बने रहे। लेकिन जब ऊमस के रूप में पेंसिल उठवत रहन त s बिना कवनो पक्ष अपहरण के उहे लिखस जनव आंख के सोझाके टके। लेखन में अइसन ईमानदारी बिरले मिले ला। (लेखक अशोक कुमार शर्मा वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)





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