Monday, May 17, 2021
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भोजपुरी: सातु के सोन्ह सवाद आ सत्यों, पढ़ीं का बा एकर दास्तान


हरेक साल बेगर कवनो फेरबदल आ बदलाव के चौदह अप्रैल के दिन भूत दर्शन परब का रूप में मनावल जाला। आजु का दिने भगवान भास्कर मर्द राशि में दाखिल होलन। एह से तिलक, बियाह, जनेव वगैरह के शुभ मुहूर्त शुरू हो जाला आ अशुभ सूचक खरवांस खाम हो जाला। बाकिर एह शुभ बदलाव के जसन व्हिम-व्हिम के व्यंजन आलाप बनाके ना कइल जाला। आजु के दिन त सातू के महातम के दिन ह। एकरो एगो वैज्ञानिक कारन बा। मीन से मकर में आइल शुरुज के तासीर में तपिस आ जाला आ ऊ धरती पर अंगार बरिसावल शुरू क। देलन। ओह पर्याप्त तन के तोड़ हऽ सातु।
एकरा जरि में बा कुदरत से मिलल नवान्न के पूजन आ सेवन।

रबी के फसिल में दलहन के महत्वपूर्ण भूमिका होला। ओहू में बहुउँती होखेला बूंट (चना)। बूंट के साग, कचरी, घुघुनी, होरहा का बाद जब पाकल फसिल कटाइला, दवंइला पर अनाज घेरे आवेला, त बुंट, जौ, लेआरी के घोनसारी में भूंजय समतजेरा सातु पिसाला। बगिया से आम के टिकोड़े तूरिके आवेला। पिआजुओ कोड़ाके नए-नए घर में आ गइल रहेला।
फेरु आम के चटनी आ पिआज़ का संगें सातू सानिके खाए के सवाद के का कहनाे के! लिबरी घोरीं, पिंड़ी गटकीं भा घोरुआ बनाके पिउ, एकरा ठढा तासीर के का कहनाे के! सातु खियाला पर खूब पियासिओगेसी आ पानी पीत रहिबो, त लूला नागेइ। आम के पकाके पन्नो बनाके गरमी से निजात पा सकेनीं आ बगली में पिआज़ो रा राणे गरमात मौसम से मुकबिला कऽ संभवनीं।

बाकिर सत की खोज के सातू अइसहीं ना खाइल जाला। पहिल होत फजीरे गंगा में भा अउर गाँव की नदी, पोखरा, कुंड में नहाके शुरुजदेव के जलाशयल जाला, फेरु नवका गूर, घीव में जौ के सातु मीरिक भगवान भगवान भास्कर आ ग्रामदेवता की पूजा पूजा जा रही है। गरीब-गुरबा आ ज़रूरतमंद के दान -दछिना दियाला.ओकरा बाद जाके सातू, आम के चटनी आ पिआज़ के नेवान कइल जाला।

सातु के गंवई जनजीवन से चोली-दामन के नेह-नाता होला। सत और नाभि सातु के महिमा बन्द के दिन होला। किछु साल पहिले नवहि लोगन में ई गीतिओ खूब मसला भइल रहे-
बलिया जाइहिया, हम लेले जाइहऽ
कोरा में बियाठीक
सतुअवा गुलाअइहऽ हो करेजौ!

नवान्न बूंट आ ओकरा से बनल दाल आ सातु के सवाद का कबो भुलाईल जा सकेला? एकरा दाल से बनल दलपूरी के नॉन लेते मुंह में पानी आ जाला। सातु के गुन के त बखान कइले ना हो सके-

सतुइया रे,
तोर गुन गूथिभूमि!

भोजपुरियन के पहिचान लिट्टी-चोखा से होला, जवन फुटेहरी का रूप में देस-दुनिया में सराहल जाला। अगर तवा पर बनाईं, त सातू भरल मकुनी कहाई। किछु लोग भोजपुरिया समाज के सातूखोर कहिके रिगावेला, बाकिर इहे सातूखोर हर जगहा
आपन बल-बेंवत-हुनर के सपने देखाके सैम केहू के नतमस्तक कऽ देलन। आजु काल्ह पेट के तमाम बेरी, गैस्ट्रिक, चीनिया रोग में राम बान इलाज सातू के घोरल लस्सी से होला।

सोचीं, पुरनकी पीढ़ी कथान निफिकिर होके जात्रा पर निकल जात रही ।बस, कान्ह प झुलत रही गमछी में सातू। जहन्न् भूख भूखि लागत, इनार-पोखरा भा चांपाकल का लगे बइठिके गमछिए में सातु सना जात आ रहे एक ही भर पानी पीके कवन गांछ का नीचे गमछे बिछे सुइत रहे। अगर गमछी में सातू कंकट खा हवा बहेगे आ किछु सातु उधिया जाऊ, त लोग हंसी करत ओके पितरन के चढ़ा देउ। फेरु त ई कहाउत मसला हो गइल-‘उधियाल सातू
पितरन के! ‘

सत और खुशहाली के परब ह। एह में नमन आ आभार परगट कइल जाला-प्रकृति का प्रति, नदी-ताल-पोखरा का प्रति, भगवान भास्कर का प्रति, धरती माई का प्रति आ अनाज उपजावे किसान-मजूर का प्रति।
शुभ के सिरीगनेस के प्रस्थान बिंदु हत्था, जवन सरधा भाव के सूचक होला आ ई निकृष्टतो में आनंद आ पौष्टिकता के भान करावेला। परंपरा आ लोकसंस्कृति के जियार थाती हत्था, जवना के अपना आ जोगा के सामाजिक समरसता के सहज-सरल रूप आउर हरदम बनावटीपन से दूर जमीनी जुड़ाव के संकलप लिहल जा सकला। (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं)





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