Friday, March 5, 2021
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भोजपुरी विशेष: लोग भुलाएगेल नेवान के माने, कंधे का होला एकर मतलब


विकास के अइसन बयार बहली कि अब त सालोंभर ​​हर बातु मिलती है। आजु से बीस-पचीस वर्ष पहिले मुरई, टमाटर, कोबी आ पालकी के साग खालि जड़वा में मिलत रहल हा। जेकर भागि ठीक रहत रहल हा, उहे खिचड़ी के दिने मटर के छेमी के पहिलका सवाद लेत रहल हा। भोजपुरी में पहिलका सवाद खातिर बाड़ा बढ़ियां शब्द बा, नेवान। खिचड़ी के दिने दही-चिउरा में उभय-चुभला के बाद सांझी खा जब खिचड़ी बनी हुई त आप केले खेत के पहिलका छेमी के दाना ओही में डालाट रहल हा। ओहि के खाइल जाइ त ओकरा के नेवान कहल जात रहल हा। अब त अब दशबार छेमी को मिलता है। सहर छौड़ीँ, गाँव तक में चौबारा टमाटर, छेमी, कोबी मिलि रहल बा।

नेवान भोजपुरी के अइसन शब्द बा, जेकर जोड़ शायदे कवनो भाषा में होखे। नेवान माने सीजन के फल, अनाज, तरकारी के पहिलका सनवाद। ओइसे त खाइल-प्याल भारतीय सभ्यता में पवित्रता के बोध से भरल रहल हा। ईन भोजन बनावल, ओकरा के परोसल आ खियावल नस के हिस्से रहल हा। एकर असर नेवान शब्द में भी रहल हा। नेवान माने पवित्रता बोध के संगे पूरा धार्मिक भाव से भगवान आ प्रकृति के धन्यवाद देत पहिलका सवाद। लेकिन विकास के पवन संगे अब नेवान के लोग भुलाइल जाते हैं। सहर के का कहीं, गांवों में लोग अह के माने बिसरल जात बा।

भारत में खेती-किसानी के हजारों-हजार साल के परंपरा बा। इन्स के पूरेची जिगी के चक्कर खेती-किसानी आ मौसमे पर केंद्रित रहल बा। एही कारण से हर मौसम में आवे वाला नवका फल, तियन-तरकारी, आदि के नेवान के खास दिन जुड़ल रहल हा। जइसे आम के टिकोड़े के नेवान के दिन सदियन से तय रहल हा, सतल। आजुकाल्ह बैसाखी पूरी दुनिया में मसले हो गइल बा। तेरह अप्रैल के दिन 1919 में बैसाखिए के दिने जलियांवाला बाग में जनरल डायर सैकशन लोगन के शूट से भूनी देले रहे। पंजाब-हरियाणा में बैसाखी खेती के कामकाज से फुरसत मिलला के बाद उपनल उल्लास के तेवहार हा। बाकिर भोजपुरिया समाज में ई तेवहार सत के नाम से मनावल जाला। एह दिन पवित्र पोखरा, सरोवर, नदी में 22an के महत्व बा, ओहू में अगर सरजू में नहाए के मिलल त समझीं कि जिनकी सकरथ हो गइल। एह दिन सतुआ के भोग लगावे की परंपरा बा। एही सतुआ संगे आम के टिकोड़े के पहिलका भोग लगावे के लोक विधान रहल बा। जवना के हमनीं नेवान कहत रहली हा जा रहा है। टिकोढ़ा के नमकीन चटनी बना के सतुआ संगे नेवान होई, भा सांझि का बने हुए पिसन के मिठकी कढ़ी, जवना के भोजपुरिया समाज गुर्हुं कहेला, ओह में टिकोढ़ा के छीलि-काटि के फांकिरोहि के डालात रहल हा।
टिकोड़े के फांकी पर भिखारी ठाकुर के रचना के एगो लाइन ओरदी आवृत …तोहार अंखिया जइसे अमवा के फंकिया …

दोयिका के आंखे ओइने कटावदार बिया, जिएसे आम के फांकी …

हर साल जइसे बुनी परल सुरू होई, भोजपुरिया समाज अपना घर में छांन् समान पर तंगल लउका, कोंहड़ा, घेंवड़ा, चिंचड़ा, खीरा आदि के पुरान सूखल फल उतार चढ़ाव रहल, ओकरा में से बिया आही-घर-दुख के अगिन-पिछड़ेपन से खाली जगह। ऊ बिया रोपि दिन। कुछु दिन में मुसरी के कान नियर ओह में से आँकुर फूटी आ देख-देख ऊ लतरि बनि जात रहल हा। ओकरा बाद एगो अइसनो दिन आवत रहल हा कि ओके खपरैल या फिल्हि परेल्से खातिर व्यवस्थाजाम करे के परे। ओकरा खातिर अलगा से छान्हि को छावात रहल हा। जइसे कुवार के महीना आई कि इजी उ फुलाए-फेरे। ओकरो पहिलका फर पहिले गाँव के मंदिर पर दीत रहल हा। ओकरा बादमे फर पंडिजी के दिएई। फेरू घर के लोग ओकर तरकारी नेवान करत रहल हा। अभियो इ परंपरा उहवें बांचल बा, जहवें छान्हि छावाता आ लउका-कोंहड़ा छान्हि परसेलल जाता है।

एही तरीके जब घर में गाई-भंइसी बच्चा दिही त 21 दिन ले ओकर दूध के घर के कवनो बूढ़-पुरनिया ना खाई। 21 दिन के बाद दूध फूलितर मानल जाला। ओकरा बाद गाइ के दूध के गिलासहि पंडिजी के दिएई। ओह में कुछु भाग ऊ गाँव के हर देव-देवता कि नान्स्लत रहले हा, आ बांचल आपना घेरे ले आयें। एकरा बाद वाला दूध गांव के मंदिर पर दियात रहल हा। फेरू ओह दूध के नेवान घर के उ बूढ़-पुरनिया करत रहले हा, जो 21 दिन तक चले बरवले रहत हा।

ओइसे गांव में होने वाला समाज अबो अह सब परंपरा के जियता। ऊ आपाना अर्जित आ अरजन में प्रकृति, समाज आ आपना से जुड़ल लोगन के हिस्से अब मानेला। एह कारण से ई परंपरा थोड़-बहुत अब ले जतिया। बाकिर दू र नइके कि ई सब परंपरा के पीछे छूटल जा तारीफ स। पहिल त कथित रूप से आइल आधुनिक शिक्षा एह परंपरन के दकियानूसी बता के विरोध कइली स, फेरू आइल उदारवाद आ नव आर्थिकी वेनि के नजरिया के संकुचित करेेजल। लेकिन सौभाग के बात बा कि लोग फेरू अपनी परंपरा के ओरी लवटता, आपन जड़ आ विरासत के खोजता आ ओकरा संगे आपन अस्तित्वो तशि रहल बा। (लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)





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