Thursday, October 22, 2020
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बिहार विधानसभा चुनाव 2020: क्या नीतीश कुमार बीजेपी के प्रति विश्वास और इस बार खुद पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं? – इस बार नीतीश कुमार भाजपा के विश्वास और अपने अति विश्वास के शिकार हो गए हैं?


इस बार नीतीश कुमार भाजपा पर विश्वास और अपने अति विश्वास के शिकार हो गए हैं?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)।

पटना:

बिहार चुनाव 2020: बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अब ज़ोरों से चल रहा है। अब तक के प्रचार में एनडीए (NDA) ने महागठबंधन (महागठबंधन) पर फैसला किया है। इस बार के चुनाव में परिणाम अभी तक एनडीए के पक्ष में दिख रहा है लेकिन उसके बाब कई बातें ऐसी देखने को मिल रहे हैं जिससे लग रहा है कि नीतीश कुमार (नीतीश कुमार) Nit भाजपा (भाजपा) विश्वास और अपने अति आत्मविश्वास के कारण एक आसान मंज़िल को लोगों के बीच सवाल और उत्तर खोजने के बुझौबल का मामला बना दिया है।

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एनडीए के प्रचार की कमान निस्संदेह नीतीश कुमार के कंधों पर है लेकिन उनके साथ सहयोग करने के लिए भाजपा के नेता नेताओं से कंधे सहित हेलिकॉप्टर से नामांकन से लेकर विधानसभा तक चलने वाले हैं। लेकिन इसके पीछे सब कुछ समान नहीं है। ये शायद पहला चुनाव होगा जहाँ भाजपा को ये सफ़ा देनी पड़ रही है कि हमारी अधिक सभा भी आएगी तो मुख्यमंत्री का ताज नीतीश कुमार के माथे पर होगा। इसके लोग अपने तरीकेक़े से अर्थ निकाल रहे हैं कि आख़िर भाजपा को कैसे मालूम है कि उनके सहयोगी की कम प्रविष्टियाँ आनी वाली हैं। या ये पहले से कोई एक्शन प्लान पर काम कर रहे हैं कि नम्बर एक पर तो वो रहे और दूसरे और तीसरे नम्बर की पार्टी के लिए नीतीश और तेजस्वी में मुकाबला हो।

यहां ऐसे सवाल करने वाले बिना बिना आधार के नहीं पूछ रहे कि आखिर नीतीश कुमार के लिए हर सीट पर त्रिकोणीय मुक़ाबला सचित्त करने वाले चिराग पासवान को व्हाक वरदहस्त प्राप्त है और ऑठिर हर दिन नीतीश की आलोचना करने वाले चिराग हर भाजपा के बागी को टिकट से क्यों नवाज़ रहे हैं लेकिन उनकी प्राथमिकता की सूची में नीतीश के पूर्व विधायक की संख्या सीमित होती है। दूसरे भाजपा ने चिराग़ के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद का समय क्यों तय किया है। हालांकि भाजपा का मानना ​​है कि उनके हर नेता ने चिराग़ पासवान पर जमकर हमला बोला है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बाद स्थिति और साफ हो जाएगी। लेकिन ये सच है कि ज़मीन पर भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं में एक कन्फ़्यूज़न का माहौल है, जो जनता दल यूनाइटेड के ना वर्कर, ना वोटर में दिख रहा है। और यहां नीतीश कुमार का भाजपा पर विश्वास महसूस हुआ है। हालांकि ये भी सच है कि उनके पास विकल्प बहुत नहीं थे। चिराग की पासवान के साथ सीटों के समझौते का भार भाजपा के ऊपर था।

हालांकि इस चुनाव में नीतीश कुमार जैसा वे चाहते हैं सीटों का बंटवारा हो या प्रत्याशियों के नाम की घोषणा, सब कुछ संयुक्त रूप से करना चाहते थे। लेकिन भाजपा के असहयोग के कारण संभव नहीं हो पाए। नीतीश ने अपनी पार्टी की तरफ़ से वो चाहे तालमेल की सीटों की संख्या या उम्मीदवारों के नामों की सूची अलग दिन में एक बार जारी की थी। लेकिन भाजपा का कहना है कि राष्ट्रीय पार्टी में किसानों के नाम पर चर्चा अलग दिन होने के कारण और चिराग़ पासवान के अलग जाने की घोषणा के बाद समीक्षा पार्टी के साथ तालमेल में देरी की वजह से एक संयुक्त सूची अब तक जारी नहीं हो पाई है। जबकि बिहार की राजनीति में ये परंपरा पिछले विधानसभा में ख़ुद नीतीश कुमार ने शुरू की जिसका उन्होंने लोकसभा चुनाव में भी अनुसरण किया। लेकिन उनके चुनावों में भले ही उनके नाम पर मुहर महीनों पहले शुरू हो गई लेकिन सब कुछ ठीक है का प्रतीक इन कदमों के बारे में उनके सहयोगी भाजपा ने गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि भाजपा का कहना है कि चुनाव तो इस बात पर है कि आम लोगों को नीतीश पसंद है या उनकी इंदिरा तेजस्वी यादव।

पहली बार अगर आप इस बार के चुनाव में बिहार में घूमेंगे तो लोगों में नीतीश कुमार के प्रति ग़ुस्सा साफ़ दिखता है। इस ग़ुस्से को NDA ख़ासकर भाजपा के समर्थकों ने यह कहकर हवा दी कि पंद्रह साल नीतीश कुमार का चेहरा हमने देखा है कि भाजपा का मुख्यमंत्री होना चाहिए। इस पर नीतीश के विरोध में लोग कहते हैं कि नीतीश कुमार ने कुछ ख़ास नहीं किया। उन्होंने जो भी पहले 5 साल के दौरान किया था, इसलिए परिवर्तनशील होना चाहिए। एक तीसरा पक्ष भी है जो कहता है बहुत हुआ नीतीश कुमार और तमम विसंगतियों के बाबुओं पर अभी भी हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। वोटर हो या आम आदमी नीतीश कुमार से उनके काम ख़ासकर उनके कुछ निर्णय के कारण लोग खासे ग़ुस्से में दिखते हैं। पहले जो बाहर से लौटे श्रमिक हैं उनका यह कहना है कि नीतीश कुमार ने हमें वापस आने पर हर बार इतना विरोध क्यों किया और जब हम लौटकर आए हैं तब डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद हमारे काम क्यों नहीं मिल रहे। जबकि उनसे बहुत वादे किए गए थे। दूसरे मतदाताओं का वर्ग जो इस चुनाव में मुखर इस बात को लेकर है। नीतीश कुमार के शासन में भ्रष्टाचार हर जगह बढ़ता जा रहा है। इन लोगों का रोना इस सरकार पर अफ़सरशा हावी है और हम तंग आ चुके हैं और नीतीश कुमार इसको कुछ समस्या मानती ही नहीं है जो हमारे लिए और बहुत अधिक कष्टकारी है।

आपको नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ तीन शिकायत मिलती हैं। वहीं कोरोना काल में नीतीश कुमार द्वारा लोगों के लिए उठाए गए कदमों की अगर आप चर्चा करेंगे तो वहां पर वो चाहे राशन कार्ड धारियों को एक हज़ार रुपये उनके खाने भी दिए गए हों या पेंशनधारियों को तीन महीने का बकाया भुगतान, हरित क्रेडिट का क्रेडिट लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देते हैं और यही कहते हैं कि नीतीश कुमार ने थोड़ा दिया था। यहां पर नीतीश कुमार का पूरा कोरोना काल से मीडिया से दूरी बनाए रखना, अब पीछे मुड़कर देखें तो आत्मघाती क़दम लगता है। ये साफ़ है कि अपने ऊपर अति आत्मविश्वास आज उनकी आलोचना का मुख्य कारण है जहां पर अपने ही कामों को लोगों तक नहीं पहुंच पाया और साथ ही मुग़लते में राज्य की जनता क्या कर लेगी। गांवों में हर जगह लोग आपको ये कहते हैं कि नए राशन कार्ड बने लेकिन घूस देने के बाद। इसके बाद उन्हें अनाज नहीं मिलता। इस चुनाव में आप जहां जाइए नीतीश कुमार के अच्छे कामों की चर्चा नहीं होती बल्कि हर जगह लोग उनकी कमियों को गिनिनकर सुनाते हैं जो इस चुनाव का एक मुख्य बिंदु है, जो पिछले दो विधान सभा चुनाव में न सुनने को, न देखने को मिलता है। था।

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हालांकि नीतीश कुमार के लिए राहत की बात यह है कि जो उनका आधारभूत अति पिछड़ा वोट हो, महादलितों का या महिला वेटर उसमें फिलहाल कोई क्रैक नहीं दिखता है और वे सब एकजुट हैं। लेकिन भाजपा के समर्थक निश्चित रूप से असमंजस की स्थिति में आज की तारीख़ में दिखते हैं। लेकिन सबका मानना ​​है कि चूंकि मुक़ाबला तेजस्वी यादव से है, हालांकि तेजस्वी यादव का महागठबंधन में सब कुछ भले ही ठाक चल रहा है और उनकी सभा में अच्छे खासे नंबर में समर्थक आ रहे हैं। पहली बार उन्होंने बेरोज़गारी, विकास जैसे मुद्दों पर एनडीए को बैकफ़ुट पर रखा गया है। लेकिन जो एनडीए का वोटर है, वो तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की जब बात आएगी तो वहां पर वो सभी कुछ भूलकर वापस नीतीश कुमार के पक्ष में ही वोट मांगेगा।



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