Sunday, October 2, 2022
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पैसा पुण्य से और धर्म पुरुषार्थ से मिलता है-साध्वी श्री प्रशम निधि म .सा .

नीमच   धर्म संस्कार के बिना आत्मा कल्याण नहीं हो सकता है। पैसा पुण्य से और धर्म पुरुषार्थ से मिलता है ।हम बच्चों को शिक्षा के ज्ञान के लिए संस्कार के लिए तो प्रतिदिन स्कूल से आने के बाद उसे प्रेरित करते हैं कि वह पढ़ाई करें और मेधावी सूची में स्थान प्राप्त करें लेकिन बच्चों को हम आत्म कल्याण के लिए धार्मिक संस्कारों के लिए ध्यान नहीं देते हैं। चिंतन का विषय है। जबकि बच्चों को धर्म संस्कार के लिए माता-पिता का विशेष कर्तव्य होता है कि वह बच्चों को धर्म संस्कार सिखाएं और मोबाइल से दूर रखें।यह बात साध्वी प्रगुणा श्री जी मसा की शिष्या  साध्वी  प्रशम निधि म .सा. ने कही। वे  महावीर जिनालय विकास नगर श्री संघ के तत्वावधान में चातुर्मास  के उपलक्ष में  आयोजित धर्म सभा में बोल रही थी। उन्होंने कहा कि 20 साल पहले यदि किसी बस स्टैंड पर हमारा बैग घूम जाए तो हमें याद रहता है लेकिन धर्म संस्कार के मंत्र उपदेश श्लोक हमें याद नहीं रहते हैं चिंतन का विषय है।हम धर्म संस्कार में रुचि लेकर शास्त्रों के श्लोक याद करें तो हमें याद होते हैं लेकिन हमारी रुचि कम है चिंता का विषय है ।संसार में जन्म मरण को प्राप्त करना यानी कि हमारी  पाप कर्म  शाखा मजबूत है। जन्म मरण की परंपरा को जड़ से उखाड़ना है तभी परम पद को प्राप्त कर सकते हैं जन्म मरण का कारण स्वयं के पाप कर्म है ।हमें सदैव पाप कर्मों से बचकर पुण्य कर्म की ओर आगे बढ़ना होगा। पाप कर्मों को घटाना चाहिए लेकिन हम तो पाप बढ़ाने के लिए सजग रहते हैं। पाप घटाने के लिए नहीं चिंतन का विषय है ।कर्म बंधन पाप बढ़ने नहीं दे इसका हमें प्रयास करना होगा ।साधु-संतों के उपदेशों को जीवन में आत्मसात करना होगा। तभी आप काम पाप कर्म से बच सकते हैं। आत्मा का ज्ञान अनंत है ।ज्ञानामानी कर्म का बंधन अज्ञानता से होता है। आत्मा पर आवरण आ जाता है तभी ज्ञान समझ में नहीं आता है। आत्मा को छोड़ कर संसार की पढ़ाई  ध्यान दे रहे हैं चिंतन का विषय है। जबकि बच्चों को धार्मिक पाठशाला से जोड़ना चाहिए लेकिन उस तरफ हमारा ध्यान नहीं है ।हम बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर तो बना रहे हैं लेकिन उसकी आत्मा के कल्याण के लिए धार्मिक संस्कारों का अभाव है।आज तक आत्मा को छोड़कर जितना भी ज्ञान हमने प्राप्त किया है वह संसारी ज्ञान  अज्ञानता है। वह ज्ञान पेट भरना सिखाता है। हम बच्चों को ₹50लाख का डोनेशन देकर डॉक्टर बना रहे हैं वह पहले 50लाख कमाएगा तो करेगा क्या। प्राचीन काल में डॉक्टर सिर्फ चेहरा देखकर रोग का उपचार करते थे ।आज डॉक्टर जांच कर उपचार करते हैं ।जांच में हजारों रुपए बर्बाद हो जाते हैं। कोरोना काल में जितने लोग भय से मरे हैं उतना लोग उपचार के अभाव में नहीं मरे लेकिन आज कोई करो कोरोना नहीं है
।कोरोना काल में हमने घर पर रह कर  धर्म प्रतिक्रमण तपस्या सभी की लेकिन आज हम क्या कर रहे हैं ।चिंतन का विषय है दुख  ज्यादा हो तो व्यक्ति धर्म पुण्य करता है।स्कूल से आने के बाद हमें बच्चों की बुराई साधु संत के सामने या किसी भी किसी भी अतिथि के सामने नहीं करना चाहिए ।यदि हम ऐसा करते हैं तो बच्चा हम से दूरी बनाएगा ।मां बच्चे को जन्म देती है लेकिन वह बच्चे का भाग्य नहीं बना सकती है ।बच्चे का भाग्य उसके संस्कार शिक्षा और ज्ञान ही बनाते है।आज 3 साल का बच्चा स्कूल से पढ़ाई करके आता है।  स्कूल से आने के बाद हम बच्चों को खेलने का अवसर नहीं देते हैं ।भोजन कराने के बाद सीधा उसे पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं ।जबकि छोटे बच्चों का मन पढ़ाई में कम खेल में ज्यादा होता है । खेल  में पढाई कर सकता है इस पर हमें ध्यान देना चाहिए ।बच्चा जब स्वयं मन से पढ़ाई करेगा तभी वह पढ़ाई कर सकता है। हम दबाव बनाकर पढ़ाते हैं लेकिन वह उस ज्ञान को सही मन से आत्मसात नहीं कर सकता है ।इस पर हमें ध्यान देना चाहिए।श्रीमती शिल्पा कच्छारा ने उम्र थोड़ी सी मिली मगर वह भी कटने लगी देखते देखते यह करो वह करो गीत प्रस्तुत किया।
धर्म सभा में साध्वी प्रगुणाश्रीजी, प्रमोदिता श्रीजी प्रशम निधि ,संस्कार निधि,सत्कार निधि म .सा. का मार्ग दर्शन भी मिला।
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