Wednesday, April 14, 2021
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निर्दोष होते हुए भी विष्णु तिवारी ने रेप और हरिजन एक्ट के मुकदमे में काटी 20 साल की सजा, रिहा होने के बाद कही ये बात


ललितपुर। वैसे तो देश का कानून कहता है कि सौ गुनेहगार छूट जाओ, लेकिन किसी भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। लेकिन उत्तर प्रदेश (उत्तर प्रदेश) के ललितपुर (ललितपुर) जनपद के रहने वाले विष्णु तिवारी (विष्णु तिवारी) की किस्मत शायद इतनी अच्छी नहीं थी। रेप व हरिजन एक्ट (बलात्कार और हरिजन अधिनियम) के मुदकमे में निचली अदालत ने उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई। 20 साल जेल में रहने के बाद हाईकोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया। वैसे तो जेल से छूटने के बाद जब अपने गांव विष्णु तिवारी पहुंचे तो लोगों ने उनका स्वागत किया। विष्णु तिवारी ने यह भी कहा कि निर्दोष साबित होने के साथ वे खुश हैं, लेकिन चेहरा बता रहा था कि ये 20 साल में जो उन्होंने खो दिया है उसकी भरपाई नहीं हो सकती है।

ये विष्णु तिवारी का दुर्भाग्य ही था कि 20 साल जेल काटने के दौरान न उन्हें एक बार भी जमानत मिली और न ही पैरोल पर छूटे, जबकि कोरोना काल में कई कैदी पैरोल पर विश्रामकर बाहर आए। इन 20 वर्षों में उन्होंने क्या खोया उसे याद करना। मुकदमे लड़ते-झगड़ते और परिवार में माता-पिता और दो भाई जा रहे थे। परिवार के पास जो पांच एकड़ जमीन थी, वह भी बिक गई। विष्णु कहते हैं कि अफ़मा इस बात का है कि वे किसी को भी कंधा नहीं दे सकते।

अब सवाल उठ रहा है
विष्णु के ऊपर सितंबर 2000 में रेप और हरिजन एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ था और वे गिरफ्तार हुए थे। उसके बाद उन्हें 2003 में निचली अदालत ने 10 साल और उम्र कैद की सजा सुनाई। डेढ़ महीने जिला जेल में रहने के बाद वे आगरा के सेंट्रल जेल शिफ्ट हो गए। विष्णु कहते हैं कि उनके वकील ने भी किया है। लेकिन हाईकोर्ट से निर्दोष साबित होने के बाद कानून के जानकार भी न्याय प्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।माता-पिता और दो भाई की मौत हो गई

20 साल जेल काटने के बाद 3 मार्च 2021 को हाईकोर्ट ने आरोपी को निर्दोष बताया और जल्द ही जल्द रिहा करने के आदेश दिए। ये पूरा मामला ललितपुर जिले के महरौनी कोतवाली के तहत सिलावन ग्राम का है। झूठे आरोप में जेल जाने के बाद पिता रामेश्वर प्रसाद तिवारी सामाजिक रूप से तिरस्कार मिलने का सदमा झेल नहीं सके और उन्हें लकवा मार गया। जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई। पिता की मौत के बाद विष्णु के बड़े भाई दिनेश तिवारी की भी मौत हो गई। वहाँ, सामाजिक तिरस्कार ने पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया। पांच मुसलमानों में दिनेश के बाद रामकिशोर तिवारी की हार्ट अटैक से मौत हो गई। उनकी मां भी निर्दोष विष्णु को याद करते-करते स्वर्ग सिधार गई, लेकिन विष्णु के परिवार में चार लोगों की मौत पर उन्हें एक की भी अर्थी में आने के लिए बेल नहीं मिली।

भाई ने कही ये बात
विष्णु तिवारी के छोटे भाई महादेव तिवारी कहते हैं कि, “मेरे भाई के साथ जो कुछ हुआ वह किसी के साथ न हो। गरीब निर्दोष फंस जाते हैं, भोगता पूरा परिवार है। जैसे हमारे परिवार ने भोगा, सब कुछ हो गया है। वह 20 है। साल उस जुर्म के लिए जेल काटकर बाहर जाएगा, जो उसने ही नहीं किया था। माता-पिता और दो मुसलमानों की मौत हो गई, उनका अर्थी को कंधा नहीं दे सका। जमीन बिक गई, पूरा परिवार सड़क पर आ गया। “

साल 2000 में गिरफ़्तार हुए
विष्णु तिवारी को वर्ष 2000 में अनुसूचित जाति की महिला की शिकायत पर रेप और हरिजन एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। तब से वे जेल में थे। वर्ष 2003 में सत्र न्यायालय ने रेप के आरोप में 10 साल और एससीएसटी के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस मामले में नए मोड़ आए 28 जनवरी 2021 को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जेल से दाखिल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए विष्णु तिवारी को न सिर्फ निर्दोष माना बल्कि राज्य सरकार पर तल्ख टिप्पणी भी की। न्यायमूर्ति डॉ। केजे थकर व न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की खंडपीठ ने कहा, “यह बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि गंभीर अपराध न होने के बावजूद आरोपी 20 साल से जेल में है। राज्य सरकार ने सजा के 14 साल पारित होने पर भी कोई रिहाई के कानून पर विचार नहीं किया। किया। इतना ही नहीं जेल से दाखिल अपील भी 16 साल दोष पूर्ण रही। कोर्ट ने यूपी के विधि सचिव को निर्देश दिया है कि वह सभी जिला प्राधिकारियों से कहे कि 10 से 14 साल की सजा भुगत चुके आजीवन कारावासियों की संस्तुति राज्य सरकार ने की है। भले ही सजा के खिलाफ अपील विचाराधीन हो।

कोर्ट ने कही ये बात
रिहा होने के बाद विष्णु कहते हैं कि ख़ुशी तो है लेकिन अफ़सोस यह है कि अब आगे क्या? घर खण्डहर हो गया है। अपने हैं। वे प्रशासन से सहयोग की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके मामले में विवेचना अधिकारी ने झूठी रिपोर्ट दाखिल की। गाय बांधने को लेकर विवाद था। लेकिन रेप और हरिजन एक्ट में मुकदमा दर्ज होने पर उन वकील ने भी धोखा दिया। बता दें कि आगरा जेल में विष्णु ने जेल अधीक्षक के जरिए कोर्ट में अपील डिटेक्टिव दाखिल की। जिसके बाद अर्जी पर हाईकोर्ट ने पाया कि रेप का आरोप साबित नहीं हुआ है। मेडिकल रिपोर्ट में जबरदस्त करने के कोई साक्ष्य नहीं थे। पीड़िता 5 महीने से गर्भवती थी, ऐसे में कोई निशान नहीं हैं जिससे यह कहा जाए कि जबरदस्ती की गई। रिपोर्ट भी पति व ससुर ने घटना के तीन दिन बाद लिखाई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि सत्र न्यायालय ललितपुर ने सबूतों पर विचार किए बगैर गलत निर्णय दिया है।

पिता की मौत की खबर भी ढाई साल मिली
छोटे भाई बताते हैं कि पिता का देहांत सात साल पहले हो गया है। लेकिन जब दो साल पहले वे विष्णु से मिले तो उन्हें जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जब तक पिता जीवित थे वे हाईकोर्ट से आगरा जेल तक चक्कर लगाते रहे। लेकिन उनके जाने के बाद परिवार की माली हालत ख़राब हो गई।





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