Sunday, December 4, 2022
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ददुआ की चुनौती को नहीं भेद पाए थे टीएन शेषन यूपी के चुनावी मैदान में डकैत का फरमान ही होता था प्रभावी


लखनऊ: वर्ष 1990 से 1996 का वह दौर, जब देश में चुनावी सुधार हो रहे थे। मंडल आंदोलन के बाद देश का राजनीतिक मिजाज बदल रहा था। जाति आधारित क्षेत्रीय दल अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे। इन दलों के जरिए अपराध की दुनिया में अपना नाम बड़ा करने वाले नेता बनने की होड़ में शामिल हो गए थे। टीएन शेषन बूथ कैप्चरिंग से लेकर तमाम सुधारों के जरिए बुलेट की जगह बैलेट को प्रभावी बनाने की कोशिश में जुटे थे। उसी समय उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के बीहड़ों में ददुआ डाकू अपनी शक्ति बढ़ा रहा था। प्रभाव ऐसा कि करीब 10 लोकसभा क्षेत्रों का चुनावी गणित तय करता था। अपनी बुलेट पावर के लिए वह कई राजनीतिक दलों को अपने दर पर सिर टिकाने को मजबूर कर दिया था। चुनावों में जीत के लिए तमाम राजनीतिक दल उससे संपर्क साधते थे। बुंदेलखंड में तब एक कहावत खूब प्रचलित थी, ‘मुहर लगेगी… पर, वरना गोली चलेगी छाती पर’। इस … में आप राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न को भरकर पढ़ सकते हैं। मतलब, जिस टीएन शेषन के खौफ ने देश के बड़े- बड़े राजनेताओं को हिलाया हुआ था।

तीन चुनावों में दिखा था शेषण का असर
यूपी के तीन चुनावों में टीएन शेषण का असर दिखा था। इसमें वर्ष 1991 और 1996 का लोकसभा चुनाव और 1993 का विधानसभा चुनाव शामिल रहा है। इन तीनों चुनावों में टीएन शेषन ने तमाम राजनीतिक दलों को दायरे में रहकर चुनावी मैदान में उतरने को विवश कर दिया। लेकिन, चुनावों में बूथ लूट की घटनाओं पर रोक लगाने में चुनाव आयोग कामयाब रहा, लेकिन चुनाव को प्रभावित करने वालों को काबू करने में कामयाबी नहीं मिली। ददुआ इसका सबसे बड़ा उदाहरण था।

कौन था ददुआ डाकू?
बुंदेलखंड के बीहड़ों में ददुआ डाकू का आतंक सिर चढ़कर बोलता था। चित्रकूट के देवकली गांव में जन्में ददुआ ने वर्ष 1975 में पहली हत्या के बाद अपना रास्ता बीहड़ों की ओर किया। इसके बाद वर्ष 2007 में एनकाउंट तक उसका फरमान ही जीत का हस्ताक्षर बनने लगा। राजनीतिक दलों के बीच उसे अपने साथ जोड़ने की होड़ मचने लगी। वर्ष 2007 में जब ददुआ का एनकाउंटर हुआ, उस समय तक उस पर लूट, डकैती, अपहरण, हत्या जैसे करीब 250 केस दर्ज थे। पिता को नंगा कर गांव में घुमाए जाने की घटना के प्रतिशोध में उसके डाकू बनने की बात कही जाती है। इसी घटना ने शिवकुमार पटेल को ददुआ के रूप में स्थापित कर दिया।

अपराध की दुनिया में उस समय डकैतों का अलग-अलग गैंग चल रहा था। चंबल में डाकुओं के गैंगों के बीच उसे अपनी जगह बनानी थी। इसलिए, 1975 से 1986 के बीच उसने गैंग तैयार किया। ददुआ का नाम 1986 में उस समय सुर्खियों में आया जब रामू का पुरवा गांव में उसके गैंग ने 9 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद पूरे इलाके में ददुआ का खौफ बढ़ने लगा। कई बड़ी घटनाओं को अंजाम देकर उसने चित्रकूट से लेकर लखनऊ तक अपनी धमक साबित की। इसके बाद उस तक पहुंच बढ़ाने का खेल शुरू हुआ।

ददुआ ने 1992 में मड़ैयन गांव में 3 लोगों की हत्या की। इसके बाद गांव को जला दिया। घटना के बाद उसने राजनीति में अपनी रुचि बढ़ासनी शुरू की। कुर्मी, पटेल और आदिवासी कार्ड खेलकर एक वर्ग में उसने अपनी पैठ बढ़ाई। तेंदू पत्ते कारोबार से अपना इकॉनिक सिस्टम मजबूत किया। फिर तो लखनऊ की सत्ता उसके सामने झुकने लगी। चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, फतेहपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, मिर्जापुर, कौशांबी की करीब 10 लोकसभा सीटों और दर्जनों विधानसभा सीटों पर ददुआ का प्रभाव स्थापित हो गया था।

ददुआ चुनावों के दौरान फरमान जारी करता था। अपने दर पर सिर झुकाने वाले नेताओं के पक्ष में वोट डालने की अपील करता था। ‘मोहर लगेगी … पर, वरना गोली पड़ेगी छाती पर’ जैसे ददुआ के फरमान को इलाके में लोग आज भी याद करते हैं। गरीबों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने के लिए ददुआ ने काम शुरू किया और अपनी छवि एक मसीहा जैसी बना ली। शोषित और वंचित समाज में उसकी इमेज रॉबिनहुड की बन गई थी। इसने टीएन शेषन के प्रभाव को भी इस इलाके में अप्रभावी बना दिया था। लोग उसके फरमान को आदेश जैसा मानकर पालन करते थे।

कौन थे टीएन शेषन?
टीएन शेषन तमिलनाडु कैडर के 1955 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। देश के 18वें कैबिनेट सचिव के रूप में उन्हें 27 मार्च 1889 को नियुक्त किया गया। इस पद पर वे 23 दिसंबर 1989 तक तैनात रहे। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर टीएन शेषन को 12 दिसंबर 1990 को नियुक्त किया गया। 11 दिसंबर 1996 तक वे इस पद पर तैनात रहे। इस दौरान उन्होंने ऐसे फैसले लिए, जिसकी नजीर दी जाती है। उनके बाद किसी भी चुनाव आयुक्त ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया। टीएन शेषन का नाम सुनकर कई नेताओं के बीच एक अलग प्रकार का माहौल बनता था। इसमें बिहार के तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव भी थे। बूथ लूट और बैलेट पेपर को छीने जाने जैसी घटनाओं पर रोक के लिए चुनावों में केंद्रीय एजेंसियों को सुरक्षा दिए जाने से लेकर आधुनिक चुनाव व्यवस्था को लागू किए जाने तक जैसे सुधार उनके समय में हुए थे।

क्यों चर्चा में हैं टीएन शेषन?
टीएन शेषन अपने निधन के तीन साल बाद क्यों चर्चा में हैं, यह सवाल उठ सकता है। आपको बता दें कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में स्वतंत्र चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर एक याचिका पर बहस चल रही थी। इस दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर दिवंगत टीएन शेषन जैसा कोई व्यक्ति नियुक्त हो। इसके लिए सबसे बड़ी जरूरत चुनाव आयोग में नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र कॉलेजियम बनाने की जताई गई। इसके बाद से टीएन शेषन सबसे अधिक सुर्खियों में बने हुए हैं। इस पूरे मामले के बाद शेषन के यूपी और बुंदेलखंड में अप्रभावी होने की बात नहीं कही जा रही है।

दरअसल, देश में चुनाव आयुक्त की नियुक्तियां केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति करते हैं। एक तरीके से माना जा सकता है कि चुनाव आयोग में सरकार की मर्जी से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति होती है। टीएन शेषन के कार्यकाल के दौरान चुनाव आयोग खासी सुर्खियों में आया। पांच सालों के दौरान चुनावों में उनके कड़क व्यक्तित्व की झलक दिखी। चुनाव आयोग ने उस समय अपने अनुसार फैसले लिए। सरकार के डर या दबाव के बिना फैसले लिए गए।

टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में चुनाव आयोग ने सरकारों, पार्टियों और उनके प्रत्याशियों पर नकेल कसी थी। चुनाव मैदान में खड़ा होने वाले उम्मीदवार उनके नाम से ही कांप जाते थे। चुनाव खर्च को पारदर्शी बनाया गया। चुनावी मैदान में दिए जाने वाले भाषणों में जाति और धर्म की जिक्र पर प्रतिबंध लगा। स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव के लिए प्रशासन पर जिम्मेदारी गठित की गई। चुनाव में किसी प्रकार की उग्रता पर प्रतिबंध लगाया गया। हालांकि, बाद में स्थिति एक बार फिर बदल गई। अब इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्त पर टीएन शेषन को याद किया है।



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