Wednesday, April 14, 2021
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कोरोना संक्रमण ने बढ़ाई चीनी उद्योग की चिंता, मिलों पर 23,000 करोड़ रुपये बकाया: कोरोना संक्रमण चीनी उद्योग को चिंतित करता है


प्रकाश नाइकनवरे ने आईएएनएस से विशेष बातचीत के दौरान बताया कि पिछले साल लॉकडाउन के दौरान होरेका (होटल, काला, कैंटीन) सेगमेंट की मांग नहीं होने के कारण अप्रैल, मई और जून के दौरान चीनी की घरेलू खपत में 10 लाख टन की कमी आई थी।

चीनी का खारखाना

चीनी मिल (फोटो साभार: फाइल)

हाइलाइट

  • 302 लाख टन चीनी उत्पादन का आँकड़ा
  • पिछले सीजन में चीनी का उत्पादन 274 लाख टन था
  • किसानों का चीनी मिलों पर 23 हजार करोड़ बकाया है

नई दिल्ली:

देश में कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ने से चीनी उद्योग की चिंता बढ़ गई, क्योंकि गर्मियों में चीनी की जो मांग आमतौर पर बढ़ जाती है उस पर लॉकडाउन जैसे प्रतिबंधात्मक कदम से प्रभाव पड़ने की आशंका है। घरेलू मांग पर असर पड़ने की सूरत में पहले से ही दवाओं के अभाव से जूझ रहे चीनी उद्योग का संकट और गहरा हो सकता है। उधर, गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर बकाया लगभग 23,000 करोड़ रुपये हो गया है। देश में सहकारी चीनी मिलों का संगठन नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (एनएफसीएसएफ) के प्रबंध निदेशक प्रकाश नीकनवरे ने कहा कि चीनी उद्योग के पास पीने की कमी के कारण गन्ने का बकाया और बढ़ सकता है। अगर बकाया 25,000 करोड़ तक पहुंच गया तो यह उद्योग के लिए काफी खराब स्थिति होगी।

प्रकाश नाइकनवरे ने आईएएनएस से विशेष बातचीत के दौरान बताया कि पिछले साल लॉकडाउन के दौरान होरेका (होटल, काला, कैंटीन) सेगमेंट की मांग नहीं होने के कारण अप्रैल, मई और जून के दौरान चीनी की घरेलू खपत में 10 लाख टन की कमी आई थी। उन्होंने कहा कि कोरोना का कहर जिस प्रकार से दोबारा गहराता जा रहा है उससे स्थिति कमोबेश वैसी पैदा होने के आसार दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर गर्मियों की चीनी मांग प्रभावित हुई तो उद्योग का संकट और बढ़ सकता है।

गर्मी के मौसम में आईस्क्रीम, कोल्ड ड्रिंक व अन्य शीतल पेय पदार्थ व शर्बत उद्योग में चीनी की मांग बढ़ जाती है, लेकिन शादी व सामूहिक पहचानोहों और होरेका सेगमेंट पर प्रतिबंध से चीनी की मांग प्रभावित हो सकती है। एनएफसीएसएफ प्रबंधन निदेशक ने कहा, “देश में इस साल फिर 300 लाख टन से ज्यादा चीनी का उत्पादन होने का अनुमान है, जबकि खपत इतनी नहीं है। इसके बाद प्रति किलो चीनी की बिक्री पर मिलों को 3.50 रुपये का घाटा हो रहा है क्योंकि चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एसएमपी) 31 रुपये प्रति किलो है जबकि मिलों की औसतन लागत 34.50 रुपये प्रति किलो है। लिहाजा, चीनी नहीं बिकने से गन्ना किसानों का भुगतान करने में कठिनाई आ रही है। “

उन्होंने कहा कि दैट्स हेज उस उद्योग की लगातार सरकार से चीनी की एमएसपी बढ़ाने की मांग कर रही है। उन्होंने कहा कि आज मिलों के पास की खुराक का जो संकट है उसका मुख्य कारण चीनी बिक्री में होने वाला घाटा है। जब तक चीनी की सीपीपी में वृद्धि नहीं होगी, तब तक उद्योग की आर्थिक सेहत में सुधार नहीं होगा और गन्ना किसानों के कहनेे का भुगतान करने में मिलों को दिक्कतें आती हैं।

हालांकि अच्छी खबर यह है कि एक्सप के मोर्चे पर भारत अच्छा कर रहा है। नीकनवरे ने बताया कि चालू शुगर सीजन 2020-21 (अक्टूबर-सितंबर) में अब तक 45 लाख टन निर्यात के निर्धारण हो गए हैं, जिसमें से 28 लाख टन चीनी मिलों के गोदामों से उठ भी चुके हैं। उन्होंने कहा कि चालू सीजन में तय कोटा 60 लाख टन चीनी का निर्यात पूरा कर लिया जाएगा। दुनिया के प्लेटफार्मों में इस समय भारतीय चीनी की मांग बनी रही क्योंकि जेस में अप्रैल में सीजन की शुरुआत ही होती है और अभी नए सीजन की उसकी चीनी बाजार में नहीं उड़ी है। जिम के बाद भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक है।

इस्मा के आकलन के अनुसार भारत में चालू सीजन के दौरान चीनी का उत्पादन 302 लाख टन हो सकता है जबकि पिछले सीजन में देश में चीनी का उत्पादन 274 लाख टन था। पिछले साल का बकाया स्टॉक 107 लाख टन को मिलाकर देश में इस साल चीनी की कुल सप्लाई चालू सीजन में 409 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत तकरीबन 260-265 लाख टन रहने का अनुमान है। एक्स 60 लाख टन होने के बाद अगले सीजन के लिए बकाया स्टॉक 90 लाख टन से कम रहेगा।



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पहली प्रकाशित: 08 अप्रैल 2021, 06:20:10 PM

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