Saturday, January 16, 2021
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केबीसी किस्सा: एक कविता की कहानी, जब अमिताभ ने मकान की नींव में रखी थी


‘क़लम को पलुहाने में पीढ़ियां लगती हैं।’ हिंदी के सबसे लोकप्रिय कवियों (लोकप्रिय हिंदी कवि) में शुमार हरिवंश राय बच्चन ने क़लम के साथ – साथ गिटार भी पलाई थी। लेकिन बंदूक चलाने में न तो पीढ़ियां लगती हैं और न ही उसे पालना-पोसना पड़ता है, शायद इसलिए बंदूकें उनके साथ बहुत समय तक नहीं मिल रही हैं। बॉलीवुड के महानायक (बॉलीवुड सुपरस्टार) और टीवी गेम शो कौन बनेगा करोड़पति के होस्ट अमिताभ बच्चन ने ‘बाबूजी’ की यादगार ताज़ा करते हुए बुधवार रात उस कविता (हरिवंश राय बच्चन कविता) की कहानी सुनाई, जिसमें हरिवंश राय बच्चन ने लिखा था:

“मैं कलम और बंदूक से चलता हूँ दोनों साथ; दुनिया में ऐसे बन्दे कम पाए जाते हैं”

केबीसी में प्रतियोगी के साथ बातचीत के दौरान एक प्रसंग से पासड़ा यह किस्सा सुनाते हुए अमिताभ बच्चन ने बताया कि उनके पिता ने अपनी कविता में ये पंक्तियां क्यों लिखी थीं। अलेस में, जब हरिवंश राय बच्चन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थे, तब ब्रिटिश व्यवस्था के तहत आर्मी की प्रशिक्षण अनिवार्य हुआ था। इसी प्रशिक्षण के तहत ‘बाबूजी’ को बंदूक भी चल पड़ी थी।

ये भी पढ़ें: – वह आखिरी भयानक केस, जब किसी महिला को अमेरिका में सज़ा-ए-मौत मिलीइस कविता पंक्ति को 27 नवंबर 2020 को अमिताभ बच्चन ने ‘बाबूजी’ की 113 वीं जयंती पर भी याद किया था। इस कविता के पीछे कौन सा इतिहास है? यह भी जानिए कि इस कविता की नींव में खुद बच्चन खानदान की कौन सी परंपरा रही है।

वह संगठन जो बाद में एनसीसी बना
अलेस में हरिवंश राय बच्चन को UTC यानी यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग को के तहत चेल चलाने का अनुभव मिला था। 1917 में ब्रिटिश राज में भारतीय डिफेंस एक्ट 1917 हुए थे, जिसे 1920 से लागू किया गया था। इस एक्ट के तहत विश्वविद्यालय कोएस को यूटीसी में बदला गया जिसका उद्देश्य था, ब्रिटिश फौजों में समय पड़ने पर सैनिकों की कमी न पड़े इसलिए छात्र जीवन में आर्मी प्रशिक्षण देकर फौजी तैयार किए जाएं।

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चूंकि प्रथम विश्व युद्ध बीत चुका था इसलिए आने वाले युद्ध समय की तैयारी ब्रिटिशों ने इस तरह की थी। यूनिवर्सिटिस में इस प्रशिक्षण के दौरान छात्रों को आर्मी जैसी ड्रेस दी जाती थी। समय के साथ इस संगठन में बदलाव हुआ और 1942 में इसे यूओटीसी यानी यूनिवर्सिटी ऑफिसर्स ट्रेनिंग को के रूप में बदल दिया गया।

चूंकि दूसरे विश्व युद्ध के समय यह आ इडिया कारगर नहीं दिखा रहा है इसलिए इस संगठन को नए सिरे से उठाए जाने पर विचार जारी किया गया था। आज़ादी के बाद एचएनंटीज़रू के नेतृत्व में बने एक कमेटी ने पूरे देश में स्कूलों और कॉलेजों में इस संगठन को फैलाने के बारे में सिफारिश की और इस तरह 15 जुलाई को 1948 को राष्ट्रीय कैडेट कोs अस्तित्व में आए, जिसे बीसीसी के नाम से ज़्यादा जाना चाहिए। जाता है।

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हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा बेहद चर्चित आत्मकथाओं में शुमार है।

लेकिन यह गन सदाबहार थी!
हरिवंश राय बच्चन से कभी पूछा गया था कि ‘मधुशाला लिखने वाले कवि ने खुद कितनी शराब पी थी?’ जवाब में उन्होंने एक छन्द दिया था:

“मैं कायस्थ कुलोद्भव, पुरलों ने इतना ढाला
मेरे तन के लोहू में, पचहत्तर प्रतिशत “

इसी तरह, हरिवंश राय बच्चन को UTC में जो अनुभव मिला, वास्तव में ‘पुरवों की तलवार का लोहा ही बंदूक में पिघलना’ की मिसाल थी। जी हां, बच्चन ने अपनी चिरचित आत्मकथा के ‘दशद्वार से सोपान तक’ खंड में इस प्रसंग का उल्लेख किया है। उन्होंने अपने प्राण मिट्ठूलाल को अपने खानदान के पहले क्रांतिकारी के तौर पर याद करते हुए बताया कि उन्होंने मरते समय ‘गोदान नवरतन’ किया था।

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ऐसा नहीं है, उनके परदादा और दादा क़लम से ज़्यादा तलवारबाज़ थे। यह बात कहती है कि दो यादगार सूत्र बच्चन ने दिए थे। पहला यह कि ‘क़लम को पलुहाने में पीढ़ियां लगती हैं’ और दूसरा यह कि किस तरह उनके घरों की स्क्रीनशॉटद में क़लम और तलवार की परंपरा रही है।

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केबीसी होस्ट करते हुए अमिताभ बच्चन की तस्वीर।

वह परंपरा जो अमिताभ ने भी निभाई थी
इसी प्रसंग में बच्चन ने लिखा कि जब 1980 के दशक में दिल्ली में उनके मकान निर्माण की बात तय हुई तो उन्होंने अमिताभ के हाथों मकान की नींव डलवाना तय किया। जब उनकी पत्नी तेजी बच्चन ने इस बारे में बात की तो उन्हें अपने खानदान का इतिहास याद आया कि उनके परदादा ने जब मकान बनवाया था, तो उसकी नींव में एक तलवार और एक क़लम रखी थी। यह सोचकर कि उनके वंश में वीर और लेखक पैदा हों।

इसके बाद जब उनके पिताजी ने फगंज वाले मकान की नींव रखी तो वातावरण में ‘गांधी की अहिंसा की गूंज’ थी इसलिए केवल मलमास रखा। इसी परंपरा के तहत हरिवंश राय ने लिखा था कि ‘अमिताभ मकान की नींव में एक क़लम रख दें’ और बाकी शिलान्यास पुरोहित के कहने के अनुसार हो। इस प्रसंग में उन्होंने बताया था कि कैसे उनके पिता और दादा ने कविता लेखन की कोशिशें की थीं। उन्होंने कहा कि नींव में उनके परदादा की रखी तलवार में तो ज़ंग लग गई लेकिन क़लम में पीढ़ियों के बाद अंकुर फूटे।





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