Monday, September 27, 2021
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- ‘महिलाएं आनंद की वस्तु हैं’ पुरुष वर्चस्व की इस मानसिकता से सख्ती से निपटना जरूरी, पढ़ें मामला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि शादी का झूठा वादा कर यौन संबंध बनाना कानून में दुराचार का अपराध होना चाहिए क्योंकि आज कल यह चलन बन गया है कि अपराधी धोखा देने के इरादे से शादी का लालच देकर यौन संबंध बनाते हैं। 

देश की बहुसंख्यक महिला आबादी में शादी एक बड़ा प्रमोशन होता है और वे आसानी से इन परिस्थितियों का शिकार हो जाती हैं, जो उनके यौन उत्पीड़न का कारण बनता है। इस तरह के मामले दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। क्योंकि अपराधी समझता है कि वह कानून का फायदा उठाकर सजा से बच जाएगा। 

इसलिए विधायिका के लिए आवश्यक है कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए स्पष्ट और विशेष कानूनी ढांचा तैयार करे, जहां अपराधी विवाह का झूठा वादा कर यौन संबंध बनाते हैं। खासकर एक बार ही यौन संबंध बनाने के मामलों में या कम समय के लिए संबंध बनाने के मामलों में।

कोर्ट ने कहा कि झूठा वादा कर यौन संबंध बनाने की प्रवृत्ति को गलत तथ्यों के आधार पर ली गई सहमति माना जाना चाहिए और इसे दुराचार की श्रेणी का अपराध माना जाए। ऐसे मामलों में अदालते मूक दर्शक नहीं बन सकती हैं और उन लोगों को लाइसेंस नहीं दिया जा सकता है जो मासूम लड़कियों का उत्पीड़न करते हैं और उनके साथ यौन संबंध बनाते हैं। 

कोर्ट ने कहा कि ‘महिलाएं आनंद की वस्तु हैं’ पुरुष वर्चस्व की इस मानसिकता से सख्ती से निपटना जरूरी है ताकि महिलाओं में सुरक्षा की भावना आए और लैंगिक असमानता को दूर करने के संवैधानिक लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। इसलिए सरकार शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए स्पष्ट और मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करे। 

कोर्ट ने कहा कि दुराचार से महिला के जीवन और मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। उसे गंभीर शारीरिक व मानसिक पीड़ा से गुजरना होता है। इसलिए जब तक ऐसा कानून नहीं बन जाता, अदालतों को सामाजिक वास्तविकता और मानवीय जीवन की आवश्यकता को देखते हुए उन महिलाओं को संरक्षण देना जारी रखना चाहिए जो शादी के झूठे वादे के कारण प्रताड़ित हुई हैं या जहां परिस्थितियां ऐसा दर्शा रही हैं कि अभियुक्त कभी भी शादी का वादा पूरा नहीं करना चाहता था या वह इस प्रकार का वादा पूरा करने में सक्षम नहीं था क्योंकि या तो वह पहले से शादीशुदा था या फिर उसने अपनी जाति, धर्म, नाम आदि छिपाकर संबंध बनाए थे।

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने कानपुर के हर्षवर्धन यादव की आपराधिक अपील खारिज करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पीड़िता और अभियुक्त एक-दूसरे को पहले से जानते थे। अभियुक्त ने शादी का वादा किया और लगातार शादी की बात व वादा करता रहा। जब पीड़िता ट्रेन से कानपुर जा रही थी तो आरोपी ने उससे मिलने की इच्छा जताई और कोर्ट मैरिज के कागजात तैयार करने की बात कहकर उसे होटल में बुलाया। 

पीड़िता होटल पहुंची तो आरोपी ने उससे यौन संबंध बनाए। यह उन दोनों के बीच पहला और आखरी यौन संबंध था। यौन संबंध बनाने के तुरंत बाद आरोपी ने शादी करने से न सिर्फ इनकार कर दिया बल्कि पीड़िता को अपशब्द कहे और वे भी जातिसूचक अपशब्द। जमानत प्रार्थना पत्र में या कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि अभियुक्त अब भी पीड़िता से शादी करने का इच्छुक है। इससे पता चलता है कि वह शुरू से ही पीड़िता से शादी का झूठा वादा करता रहा और यौन संबंध बनाने के लिए पीड़िता पर भावनात्मक दबाव डाला। उसके बाद जैसे ही अपने उद्देश्य में कामयाब हुआ उसने तुरंत पीड़िता से शादी करने से इनकार कर दिया। 

कोर्ट ने इसी के साथ अभियुक्त की अपराधिक अपील खारिज कर दी। इस मामले में बचाव पक्ष का तर्क था कि अभियुक्त व पीड़िता एक-दूसरे को काफी समय से जानते थे और उनके बीच आपसी सहमति से संबंध बने। याची को ब्लैकमेल करने के इरादे से पीड़िता ने झूठी शिकायत दर्ज कराई है। कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना। इस मामले में पीड़िता ने अपीलार्थी के खिलाफ कानपुर नगर के कलेक्टरगंज थाने में दुराचार और एसटी/एससी एक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया है।

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