Wednesday, October 21, 2020
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अलीगढ़: वैसे तो दुनिया में मेरा नाम तालों के लिए जाना जाता है, लेकिन मेरा इतिहास रामायण-महाभारत से जुड़ा है। अलीगढ़ – समाचार हिंदी में


अलीगढ। मैं उत्तर प्रदेश (उत्तर प्रदेश) के प्रमुख शहरों में से एक अलीगढ़ (अलीगढ़) हूं। दुनिया भर में अपने तालों के लिए मशहूर हूं, लेकिन इसके अलावा भी मेरी पहचान है। 21 वीं सदी में मेरी पहचान अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और इसके परिसर में होने वाले विरोध के लिए जाना जाता है। वैसे मेरा इतिहास ट्रीट और द्वापर युग से जुड़ा हुआ है। हालांकि आज मैं गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा हूं।

इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान

उत्तर प्रदेश का एक शहर जिसका आधुनिक भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसे कलक्टर गंज के नाम से जाना जाता था। दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेज़ों ने नें 1803 ई। में मराठों से छीन लिया और इससे दिल्ली को जीत में उन्हें बड़ी मदद मिली। सन 1857 के सिपाही-विद्रोह का यह मुख्य केंद्र रहा। अलीगढ़ शहर में मुसलमानों की आबादी अधिक है।

अत्यधिक प्राचीन शहरशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाय तो अलीगढ़ (कोल) एक अत्यधिक प्राचीन शहर है। महाभारत के एक समीक्षाकार के अनुसार अनुमान तो पांच हजार वर्ष पूर्व कोई काशीरिव-कौशल नामक चन्द्रवंशी राजा यहाँ राज्य करता था और तब उसकी इस राजधानी का नाम कौशाम्बी था। बाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख पाया जाता है। इसके बाद काशरिव को परजित कर कोल ने एक दैत्यराज को का बादशाह बना दिया और उसने अपने नाम के अनुकूल इस स्थल का नाम कोल रख दिया। यह वह समय था जब पांडव हस्तिनापुर से अपनी राजधानी उठाकर तत्कालीन बुलंदशहर लाये थे। यहाँ काफी दिन कोल का शासन रहा। उसी काल में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जिन्हें दाऊजी महाराज के नाम से पुकारते हैं द्वापुर युग के अन्त में रामघाट गंगा स्नान के लिए यहां से पास गुजरे तो उन्होंने स्थानीय खैर रोड पर अलीगढ़ नगर से लगभग 5 मीटर मीटर दूर स्थित प्राचीन अष्ट स्थल श्री। खेरेश्वरधाम पर अपना पड़ाव डाला गया था। दैत्य सम्राट कोल का बध करके अपना हथियार हल जहाँ जाना धोया था उस स्थान का नाम हल्दुआ हो गया। उनके सेनापति हरदेव ने उसी गांव के निकट ही अपने नाम के आधार पर जिस स्थान पर पैठ लगवाई थी उसी का नाम कलानार में हरदुआगंज हो गया। बलराम ने बाद में कोल का राज्य पंडवों को दे दिया था, लेकिन काफी प्रचलित हो जाने के कारण इसका नाम नहीं बदला। मथुरा संगालह में जो सिक्के 200 बी सी के सुरक्षित हैं, वह भी हरदुआगंज, सासनी और लाखनू के समीप की गई exc में ही प्राप्त हुए थे।

पौराणिक कथाओं में भी नाम

पौराणिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि इस क्षेत्र में कभी कोही नाम के ऋषि रहते थे जिनके आश्रम का नाम कोहिला आश्रम था। कलानार में ठठिला कोल हो गया। कथा यह भी है कि कोहिलाश्रम और मथुरा के मध्य महर्षि विश्वामित्र का भी आश्रम था। वर्तमान अलीगढ़ जनपद में स्थित वेसवा नाम का कस्बा जहां प्राचीन ऐतिहासिक सरोवर धरणीधर है, उसी विश्वामित्र आश्रम का अवशेष स्मृति चिन्ह है। अलीगढ़ ब्रजमण्डल के किनारे अर्थात कोर पर स्थित होने से कुछ इतिहासकारों का यह भी मत है कि इस कोर शब्द को ही कलानार में कोल कहा जाने लगा। महाभारत काल के पश्चात धीरे-धीरे जब इस क्षेत्र के शासकों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हुए तो उनमें राजपूत, नंद, मौर्य, शुग, शक, कुशान, नाम, गुप्त, और वर्धन वंश के राजा यत्र तत्र अधिपति होते रहे।

इतिहासकारों का ये कहना है

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर जमाल मौहम्मद सिद्दीकी ने अपनी पुस्तक अलीगढ़ जनपद का ऐतिहासिक सर्वेक्षण में लगभग 200 पुरानी बस्तियों और तलों का उल्लेख किया है जो अपनी गर्त में उक्त राजवंशों के अवशेष छुपाये हैं। अलीगढ़ यार्डैटियर के लेखक एसआर नेविल के अनुसार जब दिल्ली पर तौमर वंश के राजा अनंगपाल सिंह का राज्य था तब केवल बरन (बुलंदशहर) में विक्रमसैन का शासन था। इसी वंश परम्परा में कालासैन के पुत्र मुकुन्दासन के बाद गोविन्दसैन और फिर विजयीराम के पुत्र श्री बुद्धसैन भी अलीगढ़ के एक प्रसिद्ध शासक रहे। उनके उत्तराधिकारी मंगलसैन थे जिन्होंने बालयेकिला पर एक मीनार गंगा दर्शन हेतु बनवाई थी, इससे विदित होता है कि तब गंगा कोल के निकट ही प्रवाह मान रहे होंगे। पुरात्विक प्रसंग के अनुसार अलीगढ़ में दो किले थे, एक किला ऊपर कोट टीले पर और दूसरा मुस्लिम विश्वविद्यालय के उत्तर में बरौली मार्ग पर स्थित है। जैन-बौद्ध काल में भी इस जनपद का नाम कोल था। विभिन्न राष्ट्राहलों में रखी गई महरावल, पंजूपुर, खेरेश्वर आदि से प्राप्त मूर्तियों को देखकर इसके बौद्ध और जैन काल के राजाओं का शासन होने की पुष्टि होती है। चाणक्यकालीन इतिहास साक्षी है कि कूटनीतिज्ञ चाणक्य की कार्यस्थली भी कोल तक थी। कलिंग विजय के उपरान्त अशोक महान ने विजय स्मारक बनवाये जिनमें कौटिल्य नाम का स्थान का भी उल्लेख होता है, यह कौटिल्य नहीं और नहीं कोल ही था।

इन्होने अलीगढ़ नाम रखा

मथुरा और भरतपुर के जाट राजा सूरजमल ने सन 1753 में कोल पर अपना अधिकार कर लिया। उसे बहुत ऊंचे स्थान पर अपना किला पसन्द न आने के कारण एक भूमिगत किले का निर्माण कराया और सन 1760 में पूर्ण होने पर इस किले का नाम रामगढ़ रख दिया। 6 नवंबर 1768 में यहां एक सिया मुस्लिम सरदार मिर्जा साहब का अधिपत्य हो गया। 1775 में उनके सिपहसालार अफरसियाब खान ने मोहम्मद (पैगम्बर) के चचेरे भाई और दमाद अली के नाम पर कोल का नाम अलीगढ़ रखा था।



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