Tuesday, January 31, 2023
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अपने परिवार की तरह अपने पड़ोसी को भी प्यार करें!

क्रिसमस दिवस (25 दिसम्बर) पर  लेख

 

-ंउचय डा0 जगदीष गांधी, षिक्षाविद् एवं संस्थापक-ंउचयप्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) इस धरती का परमपिता परमात्मा एक है:-ंउचय
क्रिसमस या बड़ा दिन ईसा मसीह या यी-रु39याु के जन्म की खु-रु39याी में 25 दिसम्बर को
मनाया जाने वाला पर्व है। आधुनिक क्रिसमस की छुट्टियों में एक दूसरे को उपहार
देना, चर्च मंे प्रार्थना समारोह और विभिन्न सजावट करना -रु39याामिल है। इस सजावट
के प्रद-रु39र्यान में क्रिसमस का पेड़, रंग-ंउचयबिरंगी रो-रु39यानियाँ, जन्म के -हजयाँकी और हॉली आदि
-रु39याामिल हैं। सांता क्लॉज को (जिसे क्रिसमस का पिता भी कहा जाता है) क्रिसमस पर बच्चों
के लिए तोहफे लाते हैं। क्रिसमस को सभी ईसाई लोगों सहित गैर-ंउचयईसाई लोग
भी इसे एक धर्मनिरपेक्ष तथा सांस्कृतिक उत्सव के रूप मे मनाते हैं। क्रिसमस के
दौरान उपहारों का आदान प्रदान, सजावट और छुट्टी के दौरान पिकनिक के कारण यह
संसार का एक बड़ा महोत्सव बन गया।
(2) परम पिता परमात्मा सारी सृ-िुनवजयट का रचयिता है:-ंउचय
ईसाई धर्म के अनुयायी इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस सारी सृ-िुनवजयट का
ई-रु39यवर एक है लेकिन वे ई-रु39यवर के व्यक्तित्व को तीन रूपों में मानते हैं:-ंउचयपहला रूप
-ंउचय परमपिता इस सारी सृ-िुनवजयट का रचयिता है और इसको संचालित करने वाला -रु39याासक भी है। वह
एक है। वह सारे जगत का पिता है। सर्वज्ञ, सर्व-रु39याक्तिमान, सर्वव्यापी, परम पवित्र, परम न्यायी
तथा परम करूणामय है। वह अनादि, अनन्त तथा पूर्ण है। वही सर्वश्रे-ुनवजयठ ई-रु39यवर सब का
परमे-रु39यवर है। दूसरा रूप -ंउचय परमपिता ने मानव देह में अपने को ई-रु39याु के रूप में प्रगट किया
ताकि पतित हुए सभी मनु-ुनवजययों को पापों से बचाया जा सके। ई-रु39याु ने मानव जाति के
पापों की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। यह मनु-ुनवजयय और पवित्र परमपिता के मिलन का मि-रु39यान
था जो ई-रु39याु की कुर्बानी से पूरा हुआ। एक सृ-िुनवजयटकर्ता परमपिता होकर उन्होंने
पापियों को नहीं मारा वरन् पाप का इलाज किया। वे भगवान और मनु-ुनवजयय के बीच की
कड़ी हैं। ई-रु39याु ने मानव जाति के कल्याण के लिए तरह-ंउचयतरह के क-ुनवजयट -हजयेले और
अन्त में सूली पर लटककर अपने प्राण त्याग दिये। प्रभु ई-रु39याु ने अपने जीवन के
द्वारा प्रेम, करूणा तथा पवित्रता की -िरु39याक्षा दी।
(3) बाइबिल केवल ईसाईयों के लिए ही नहीं वरन् सारी मानव जाति के लिए है:-ंउचय
तीसरा रूप -ंउचय पवित्र आत्मा परमपिता परमात्मा का तीसरा व्यक्तित्व है जिनके प्रभाव
में व्यक्ति अपने अन्दर परमपिता परमात्मा का अहसास करता है। पवित्रात्मा मनु-ुनवजयय का चित्त
-रु39याुद्ध करती है और उसे भगवान के नजदीक ले जाती है। वह भगवान की प्रेरणा तथा
ई-रु39यवर की -रु39याक्ति है। वह प्रेम, आनन्द, वि-रु39यवास, भक्ति जैसे दैवी गुणों को विकसित

करती है। जब तक पवित्रात्मा की कृपा न होगी, तब तक मनु-ुनवजयय दो-ुनवजयाों से मुक्त होकर
भगवान के चरणों में नहीं जा सकेगा। बाइबिल पवित्र ग्रन्थ अर्थात ई-रु39यवरीय पुस्तक
है। ई-रु39याु की आत्मा में हिब्रू भा-ुनवजयाा में पवित्र बाईबिल का ज्ञान आया। ई-रु39याु
प्रभु से तथा आपस में एक-ंउचयदूसरे से प्रेम करने का सन्दे-रु39या छिप-ंउचयछिप कर लोगों को
देते थे। ई-रु39याु ने कहा धरती का साम्राज्य उनका होगा जो दयालु होंगे
तथा दूसरांे पर करूणा करेंगें। बाईबिल के ज्ञान का अनेक भा-ुनवजयााओं में
अनुवाद हुआ और यह ई-रु39यवरीय ज्ञान संसार भर में फैल गया। करूणा का यह गुण
केवल ईसाईयों के लिए ही नहीं है बल्कि सारी मानव जाति के लिए है।
(4) प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को जानना ही मानव जीवन का परम उद्दे-रु39यय है:-ंउचय
ई-रु39याु का जन्म आज से लगभग 2000 व-ुनवजर्या पूर्व येरू-रु39यालम के पास बैथेलहम
(फिलिस्तीन-ंउचयइजराइल) में हुआ था। उनके पिता जोसेफ ब-सजय़ई एवं मां मरियम
अत्यन्त ही निर्धन थे। ई-रु39याु को राजा के आदे-रु39या से जब सूली दी जा रही थी तब वे
परमपिता परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे -ंउचयहे परमात्मा! तू इन्हें माफ कर दे जो
मु-हजये सूली दे रहे हैं क्योंकि ये अज्ञानी हैं अपराधी नहीं। ई-रु39याु ने
छोटी उम्र में ही प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया था फिर धरती और
आका-रु39या की कोई -रु39याक्ति उन्हें प्रभु का कार्य करने से रोक नहीं सकी। जिन
लोगों ने ई-रु39याु को सूली पर च-सजय़ाया देखते ही देखते उनके कठोर हृदय पिघल
गये। सभी रो-ंउचयरोकर अफसोस करने लगे कि हमने अपने रक्षक को क्यों मार डाला?
ई-रु39याु ने कहा धरती का साम्राज्य उनका होगा जो दयालु होंगे तथा
दूसरांे पर करूणा करेंगे। ई-रु39याु जीवन के अन्तिम क्षणों में संसार में ‘करूणा’ का
सागर बहाकर चले गये। परमात्मा ने पवित्र पुस्तक बाईबिल की -िरु39याक्षाओं के द्वारा ई-रु39याु
के माध्यम से करूणा का सन्दे-रु39या सारी मानव जाति को दिया। इसलिए हमें भी ई-रु39याु की
तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते
हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।
(5) आत्मा परमात्मा का अं-रु39या है उसे परमात्मा को सौंप दो:-ंउचय
ईसाई धर्म का बुनियादी वि-रु39यवास यह है कि परमपिता परमात्मा सारे जगत का पिता है।
हम सब पृथ्वीवासी उस परमपिता परमात्मा की संतानें हैं। हम सब भाई-ंउचयभाई हैं।
हमें एक-ंउचयदूसरे के साथ करूणा का, दया का, प्रेम का तथा अपनेपन का व्यवहार करना
चाहिए। प्रभु ई-रु39याु ने अपने जीवन से, अपने व्यवहार से, अपने कर्म से, अपने वचन से
और अपने मन से इस प्रेम की ही -िरु39याक्षा दी है। ई-रु39याु ने कहा कि जो राजा का है उसे
राजा को दे दो तथा जो परमात्मा का है उसे परमात्मा को सौंप दो। अर्थात
सांसारिक चीजों पर राजा का अधिकार हो सकता है लेकिन हमारी आत्मा परमात्मा
की है उसे परमात्मा को ही सौंपा जा सकता है।
(6) प्रभु तो सर्वत्र व्याप्त है पर हम अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा तथा
आज्ञा को पहचाने कैसे?

प्रभु तो सर्वत्र व्याप्त है पर हम उसको देख नहीं सकते। हम उसको सुन नहीं
सकते। हम उसको छू नहीं सकते तो फिर हम प्रभु को जाने कैसे? अपनी इच्छा नहीं
वरन् प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को हम पहचाने कैसे? बच्चों द्वारा प्रतिदिन की जाने
वाली हमारे स्कूल की प्रार्थना है कि हे मेरे परमात्मा मैं साक्षी देता हूँ कि
तूने मु-हजये इसलिए उत्पन्न किया है कि मैं तू-हजये जाँनू और तेरी पूजा करूँ। इस प्रकार
प्रभु ने हमें केवल दो कार्यों (पहला) परमात्मा को जानने और (दूसरा)
उसकी पूजा करने के लिए ही इस पृथ्वी पर मनु-ुनवजयय रूप में उत्पन्न किया है। प्रभु को
जानने का मतलब है परमात्मा द्वारा युग-ंउचययुग में अपने अवतारों के माध्यम से दिये गये
पवित्र धर्म ग्रंथों गीता की न्याय, त्रिपटक की समता, बाईबिल की करुणा, कुरान की
भाईचारा, गुरू ग्रन्थ साहेब की त्याग व किताबे अकदस की हृदय की एकता आदि की
ई-रु39यवरीय -िरु39याक्षाओं को जानना और परमात्मा की पूजा करने का मतलब है कि परमात्मा
की -िरु39याक्षाओं पर जीवन-ंउचयपर्यन्त दृ-सजय़तापूर्वक चलते हुए अपनी नौकरी या व्यवसाय करके
अपनी आत्मा का विकास करना। हमें प्रभु की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर जीवन
जीना चाहिए। हमें अपनी इच्छा को प्रभु की इच्छा बनाने की अज्ञानता कभी
नहीं करनी चाहिए।
(7) पवित्र भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करना, यही परमात्मा की सच्ची पूजा है
ः-ंउचय
हमारे जीवन का उद्दे-रु39यय भी अपने आत्मा के परमपिता परमात्मा की तरह ही सारी
मानव जाति की सेवा करने का होना चाहिए। इसके लिए हमें परमपिता परमात्मा की
-िरु39याक्षाओं को अपने जीवन में अपनाना होगा। परमात्मा से जुड़ने पर हम महसूस
करेंगे कि परमात्मा हमारी रक्षा तथा मदद के लिए अपने अदृ-रु39यय दिव्य सैनिकों की
टुकड़ियाँ एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी और इसी प्रकार अनेक
टुकड़ियाँ भेजता रहता है। इसके लिए पहले हम प्रभु की -िरु39याक्षाओं को स्वयं पूरी
एकाग्रता से जानें, उनको सम-हजयें, उनका मनन करें, उनकी गहराईयों में जाये व
ई-रु39यवर के मंतव्य को सम-हजये और फिर उन -िरु39याक्षाओं पर चलते हुए प्रभु का कार्य मानकर
पवित्र भावना से अपनी नौकरी या व्यवसाय करें। यही प्रभु की सच्ची पूजा, इबादत, प्रेयर
व प्रार्थना है। इसके अतिरिक्त परमात्मा की पूजा का और कोई भी तरीका नहीं
है। इसलिए हमें अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का
पालन करना चाहिए क्योंकि जो कोई प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान
लेते हैं उन्हें धरती तथा आका-रु39या की कोई भी -रु39याक्ति प्रभु का कार्य
करने से रोक नहीं सकती।
(8) विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ-ंउचयधाम:-ंउचय
नोबेल -रु39याान्ति पुरस्कार प्राप्त श्री नेल्सन मण्डेला के अनुसार वि-रु39यव में
-िरु39याक्षा सबसे -रु39याक्ति-रु39यााली हथियार है जिससे सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है। विद्यालय
एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी धर्मों के बच्चे तथा सभी धर्मों के टीचर्स एक
स्थान पर एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का यह ही सही
तरीका है। सारी सृ-िुनवजयट को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने

वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही
परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भा-ुनवजयाा में करें, उनको
सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतः परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही
सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो
सबमें आपसी प्रेम भाव भी ब-सजय़ जायेगा और संसार में सुख, एकता, -रु39याान्ति, करूणा,
त्याग, न्याय एवं अभूतपूर्व समृद्धि आ जायेगी।
(9) धरती का साम्राज्य उनका होगा जो दयालु होंगे:-ंउचय
ई-रु39याु कहते हैं: धन्य हैं वे, जो मन के दीन, नम्र, दयालु, पवित्र, -रु39याुद्ध
हृदयवाले, लोगों के बीच मेल-ंउचयजोल ब-सजय़ाने वालें, -रु39याान्ति स्थापित कराने वाले,
धर्म के जिज्ञासु और परहित के लिए क-ुनवजयट उठाने वाले हैं। स्वर्ग का राज्य उन्हीं का
है। वे ही भगवान के पुत्र कहलायेंगे। सच्चा ई-रु39याु का भक्त वही है जो मनु-ुनवजयय
मात्र से प्रेम करता है और प्राणि मात्र की सेवा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के
लिए सदा-ंउचयसर्वदा तैयार रहता है। ई-रु39याु ने सीख दी कि तुम वि-रु39यव के प्रका-रु39या हो। तुम
किसलिए अपने को अपवित्र और पापी सम-हजयते हो? परम पवित्र प्रभु की सन्तान को ऐसी मान्यता
-रु39याोभा नहीं देती। परमात्मा की दृ-िुनवजयट में सब बराबर है कोई नीचा नहीं, कोई
ऊँचा नहीं। प्रभु का राज्य कहीं दूर नहीं है। वह हमारे भीतर ही है। हम
अपने हृदय को पवित्र करके धरती पर प्रभु का आध्यात्मिक साम्राज्य स्थापित कर सकते
हैं। इस प्रकार क्रिसमस का पर्व हमें यह संदे-रु39या देता है कि हमें केवल अपने
सगे-ंउचयसंबंधियों को ही प्रेम नहीं करना है बल्कि हमें बिना किसी भेदभाव
के अपने परिवार व पड़ोसी के साथ ही समस्त मानवजाति से प्रेम करना चाहिए। सभी
के प्रति करुणा की भावना रखनी चाहिए।
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